Tuesday, December 13, 2011

अजूबा...अब तलाक से भी बचाएंगे डाकघर !

कहते हैं पत्रों और संवेदनाओं का बड़ा गहरा रिश्ता है. कई बार पत्रों में कैद भावनाएं इतनी जीवंत हो उठती हैं कि रिश्तों में पसरता अविश्वास या दूरियाँ नजदीकियों में बदलने लगता है. शायद यही कारण है कि चीन के सरकारी डाकघर एक ऐसी मुहिम को बढ़ावा दे रहे हैं जिससे वहाँ बढ़ते तलाक की संख्या कम की जा सकेगी.

चीन के सरकारी डाकघर की इस योजना के अंतर्गत नवविवाहित जोड़े एक सील लिफ़ाफ़े में अपना प्रेम पत्र भेज सकेंगे जिसे उनके विवाह के सात साल बाद उनके जीवन साथी तक पहुँचा दिया जाएगा. इसके पीछे सोच यह है कि तलाक के बारे में सोचने वाले जोड़ों को समय रहते यह याद दिलाया जाए कि आख़िर वह एक दूसरे के नज़दीक क्यों आए थे.

आज की इस भागदौड़ वाली इंस्टेंट लाइफ में कईयों को डाकघर की यह मुहिम अनूठी लग रही है और यही कारण है कि चीनी जोड़े इसे अपनाने में पीछे नहीं हट रहे हैं.वह चाहते हैं कि उनका प्यार सात सालों तक परवान चढ़ता रहे, इसलिए वह डाकघर की इस योजना का लाभ उठा कर एक दूसरे को पत्र लिखने के बारे में सोच रहे हैं.

गौरतलब है कि चीन में पिछले दशक में असफल विवाहों की संख्या दोगुनी हुई है.पिछले साल 19 लाख 60 हज़ार जोड़ों ने तलाक की अर्ज़ी दी थी जो कि 2009 से 14.5 फ़ीसदी ज़्यादा है. एक ज़माने में चीन में बहुत कम तलाक होते थे, लेकिन अब वह आम हो गए हैं. दूसरे देशों की तरह यहां भी बढ़ती व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आमदनी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

हाल में चीन में शादी के नियमों में परिवर्तन ने तलाक के मुद्दे को केंद्र बिंदु में ला दिया है.नया कानून आने से पहले अगर किसी जोड़े में तलाक होता था तो उनमें घर बराबर-बराबर बाँटा जाता था. लेकिन अब बँटवारा इस आधार पर होगा कि घर ख़रीदने में उनमें से किसने कितना पैसा लगाया है.यह एक बड़ा बदलाव है.ऐसे में घरों की बढ़ती कीमतों के साथ तलाक की दर में भी वृध्दि हो रही है.यही कारण है कि हाल के एक सर्वेक्षण में 70 फ़ीसदी चीनी महिलाओं ने कहा कि वह उसी पुरुष के साथ शादी करना पसंद करेंगी जिसके पास पहले से अपना कोई घर हो.जो भी हो, इस नए कानून से कई महिलाओं की चिंताएं बढ़ गई हैं.

ऐसे में चीन के सरकारी डाकघरों को उम्मीद है कि इस नई योजना से कुछ लोगो की तलाक के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी. यही नहीं, लोगों में प्यार बरकरार रहे इसके लिए चीनी डाकघर विवाह की हर सालगिरह पर विशेष डाक टिकट, पोस्टकार्ड और यहाँ तक कि प्रेम पासपोर्ट भी जारी कर रहे हैं जिन पर हर सालगिरह पर मोहर लगाई जाती है. फ़िलहाल इस योजना के जनक और बीजिंग डाकघर के प्रबंधक सन बुक्सिन का मानना है कि इसकी सफलता का पता सात वर्ष के बाद ही लग पाएगा.जो भी हो, पर चीन के सरकारी डाक-घरों की यह मुहिम रोचक है और और माना जाना चाहिए कि इसका अंजाम भी खूबसूरत ही होगा.

Thursday, December 8, 2011

जनसत्ता में भी छाई देवानंद की चिट्ठियाँ : डाकिया डाक लाया


आज 8 दिसंबर 2011 को को प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र 'जनसत्ता' के सम्पादकीय पृष्ठ पर समांतर स्तम्भ के तहत 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग पर 4 दिसंबर को प्रकाशित पोस्ट चिट्ठियों से आरंभ होकर फिल्मों में ख़त्म हुआ देवानंद का सफ़र को 'सिनेमा का सदाबहार' शीर्षक से प्रस्तुत किया गया है.

इससे पहले 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग और इसकी प्रविष्टियों की चर्चा जनसत्ता, दैनिक हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, राजस्थान पत्रिका, उदंती जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में हो चुकी है.

गौरतलब है कि "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग की चर्चा सबसे पहले 8 अप्रैल, 2009 को दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में 'ब्लॉग वार्ता' के अंतर्गत की गई थी। रवीश कुमार जी ने इसे बेहद रोचक रूप में प्रस्तुत किया था. इसके बाद इसकी चर्चा 29 अप्रैल 2009 के दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' पत्र के परिशिष्ट 'आधी दुनिया' में 'बिन्दास ब्लाग' के तहत की गई. "प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा" के अनुसार इस ब्लॉग की 22 अक्तूबर की पोस्ट "2009 ईसा पूर्व में लिखा गया दुनिया का पहला पत्र'' की चर्चा 11 नवम्बर 2009 को राजस्थान पत्रिका, जयपुर संस्करण के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग चंक' में की गई।


....ऐसे में यह जानकर अच्छा लगता है कि इस ब्लॉग को आप सभी का भरपूर प्यार व सहयोग मिल रहा है. आप सभी शुभेच्छुओं का आभार !!

चित्र साभार : Blogs in Media

Sunday, December 4, 2011

चिट्ठियों से आरंभ होकर फिल्मों में ख़त्म हुआ देवानंद का सफ़र

भारत के स्क्रीन लीजेंड्स की अगर कभी लिस्ट बनाई जाएगी तो उसमें हिंदी फ़िल्मों के सदाबहार अभिनेता और निर्माता-निर्देशक देवानंद साहब का नाम सबसे ऊपर शुमार होगा. वह सही मायने में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और अभिनेता, निर्देशक तथा निर्माता के रूप में उन्होंने विभिन्न भूमिकाएं निभाईं. भारतीय सिनेमा के सदाबहार अभिनेता देवानंद ने 1946 में फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था और 88 साल की उम्र में इस सदाबहार नौजवान का ग्लैमर की दुनिया में 65 साल काम करने के बाद 4 दिसंबर, 2011 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने से इंतकाल हो गया. देवानंद के बारे में कहा जाता है कि वो कभी हार न मानने वाले लोगों में से थे और 88 वर्ष की उम्र में पूरे जोश के साथ नई फ़िल्म बनाने की तैयारी में लगे हुए थे. उनका सबसे बड़ा सशक्त पक्ष यह रहा कि उनकी उम्र कुछ भी रही हो, उन्होंने खुद को हमेशा युवा ही माना. सामाजिक मुद्दों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का कोई मुकाबला नहीं था तथा सिनेमा में भी उन्होंने जिन मुद्दों को उठाया उनसे समाज में नए मापदंड स्थापित करने में मदद मिली। देवानंद हमेशा अपनी शर्तों पर जिए. देवानंद ने जिंदगी को कितनी खूबसूरती के साथ जिया, इसका अंदाजा उनकी आत्मकथा के शीर्षक 'रोमांसिंग विद लाइफ' से पता चलता है। 438 पृष्ठों की उनकी इस आत्मकथा का विमोचन खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था। देवानंद का मानना था की उनकी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में उससे भी ज्यादा है जितना जमाना जानता है। पुस्तक में देवानंद ने अपनी युवावस्था, लाहौर, गुरदासपुर, फिल्मी दुनिया के संघर्ष, गुरुदत्त के साथ मित्रवत रिश्तों और सुरैया के साथ अपने संबंधों का उल्लेख किया है। इसके अलावा देवानंद ने अपने भाई विजय आनंद और चेतन आनंद के संबंध में भी इस किताब में लिखा है। एक बार उन्होंने कहा था कि रोमांस का मतलब महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने से ही क्यों लगाया जाता है। इसके मायने किसी के हाथ को अपने हाथ में लेना और बात करना भी हो सकते हैं। यह उनकी जिन्दादिली ही थी.

देवानंद का जन्म पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में 26 सितंबर, 1923 को हुआ था. उनका बचपन का नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था. उनके पिता जी पेशे से वकील थे. देवानंद ने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की. इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी.आर.चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं. पर बहुत काम लोगों को पता होगा कि देवानंद के कैरियर की शुरुआत चिट्ठियों के साथ हुई थी. जी हाँ, देवानंद साहब की उम्र जब बमुश्किल 20-21 साल की थी, तो 1945 में उन्हें पहला ब्रेक मिला और देवानंद साहब को सेना में सेंसर ऑफ़िस में पहली नौकरी मिली. इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे.उस समय दितीय विश्व-युद्ध चल रहा था. उनका काम होता था फ़ौजियों की चिट्ठियों को सेंसर करना. सच में एक से एक बढ़कर रोमांटिक चिट्ठियाँ होती थी. एक चिट्ठी का ज़िक्र स्वयं देवानंद साहब बड़ी दिल्लगी से करते हैं, जिसमें एक मेजर ने अपनी बीवी को लिखा कि उसका मन कर रहा है कि वो इसी वक़्त नौकरी छोड़कर उसकी बाहों में चला आए. बस इसी के बाद देवानंद साहब को भी ऐसा लगा कि मैं भी नौकरी छोड़ दूँ. बस फिर छोड़ दी नौकरी, लेकिन क़िस्मत की बात है कि उसके तीसरे ही दिन उन्हें प्रभात फ़िल्म्स से बुलावा आ गया और इस प्रकार देवानंद ने 1946 में फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा और फ़िल्म थी -प्रभात स्टूडियो की 'हम एक हैं'. दुर्भाग्यवश यह फिल्म असफल ही रही. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म “जिद्दी” देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई. इस फिल्म से वो बड़े अभिनेता के रुप में स्थापित हो गए. इसके बाद उन्हें कई फ़िल्में मिलीं. इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया और नवकेतन बैनर की स्थापना की. नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म 'अफसर' का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी. इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे. इसके बाद देवानंद ने कई बेहतरीन फ़िल्में की और अपने अभिनय का लोहा मनवाया. इन फ़िल्मों में पेइंग गेस्ट, बाज़ी, ज्वेल थीप, सीआईडी, जॉनी मेरा नाम, टैक्सी ड्राइवर,फंटुश, नौ दो ग्यारह, काला पानी, अमीर गरीब, हरे रामा हरे कृष्णा और देस परदेस का नाम लिया जा सकता है. देवानंद केवल अभिनेता ही नहीं थे. उन्होंने फ़िल्मों का निर्देशन किया, फ़िल्में प्रोड्यूस भी कीं. नवकेतन फ़िल्म प्रोडक्शन के बैनर तले उन्होंने 35 से अधिक फ़िल्मों का निर्माण किया.

देवानंद प्रख्यात उपन्यासकार आर.के. नारायण से काफी प्रभावित थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे. आर.के.नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी. इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया. देवानंद को दो फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिले. 1958 में फ़िल्म काला पानी के लिए और फिर 1966 में गाइड के लिए.गाइड ने फ़िल्मफेयर अवार्ड में पांच अवार्डों का रिकार्ड भी बनाया. इतना ही नहीं गाइड 1966 में भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए नामांकित भी हुई थी। आगे चलकर देवानंद ने नोबल पुरस्कार विजेता पर्ल बक के साथ मिलकर अंग्रेज़ी में भी गाइड का निर्माण किया था.

देवानंद अपने काले कोट की वजह से भी काफी चर्चा में रहे. देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे. उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो युवाओं ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी. वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना. दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी.देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। देवानंद सुरैया को कभी भुला नहीं पाए और अक्सर उन्होंने सुरैया को अपनी जिंदगी का प्यार कहा है। वह भी इस हकीकत के बावजूद कि उन्होंने बाद में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक से विवाह कर लिया था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे। अपनी आत्मकथा में भी देवानंद ने सुरैया के साथ अपने संबंधों का उल्लेख किया है। जीनत अमान के साथ भी उनके प्यार के चर्चे खूब रहे. देवानंद ने 'हरे रामा हरे कृष्णा' के ज़रिए ज़ीनत अमान की खोज की.अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में उन्होंने लिखा कि वे जीनत अमान से बेहद प्यार करते थे और इसीलिए उन्हें अपनी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में अभिनेत्री बनाया था। लेकिन देवानंद का यह प्यार परवान चढ़ने से पहले ही टूट गया, क्योंकि उन्होंने जीनत अमान को एक पार्टी में राजकपूर की बाहों में देख लिया था। गौरतलब है कि देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी. दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया.कई अभिनेत्रियों से उनके संबंधों को लेकर बातें उड़ीं, पर देवानंद अपनी ही धुन में मस्त व्यक्ति थे. टीना मुनीम,नताशा सिन्हा व एकता जैसी तमाम अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देवानंद को ही जाता है.

वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देवानंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया. हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन पर फिल्माया गया गीत- 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' उनके जीवन के भी बहुत करीब था.इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा का भी निर्देशन किया जिसकी कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया. अभी सितम्बर 2011 में देवानंद जी की फिल्म चार्जशीट रिलीज हुई थी. फ़िल्मों में देवानंद के योगदान को देखते हुए उन्हें 1993 में फिल्मफेयर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड दिया गया. उन्हें 2001 में पद्म भूषण और 2002 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया।


देवानंद साहब के जाने से हिंदी फिल्म जगत का एक महत्वपूर्ण युग ख़त्म हो गया....श्रद्धांजलि !!

हाइकु-दिवस : कृष्ण कुमार यादव के डाक-हाइकु

डाक-टिकट
घूमे सारी दुनिया
रंग-बिरंगे।

छुपी हुई हैं
पत्रों की दुनिया में
संवेदनाएं।

रिश्तों की उष्मा
पत्रों से पिघलती
मौन टूटता।

हस्तलिखित
शब्दों की ये दुनिया
गुनगुनाती।

( हाइकु हिंदी-साहित्य में तेजी से अपने पंख फ़ैलाने लगा है. कम शब्दों (5-7-5)में मारक बात. भारत में प्रो० सत्यभूषण वर्मा का नाम हाइकु के अग्रज के रूप में लिया जाता है. यही कारण है कि उनका जन्मदिन हाइकु-दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज 4 दिसम्बर को उनका जन्म-दिवस है, अत: आज ही हाइकु दिवस भी है। इस बार हाइकुकार इसे पूरे सप्ताह तक (4 दिसम्बर - 11 दिसम्बर 2011 तक) मना रहे हैं. इस अवसर पर मेरे कुछ डाक सम्बंधित हाइकु !!)
*******************************


कृष्ण कुमार यादव : 10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ. प्र.) में जन्म. आरंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1999 में राजनीति शास्त्र में परास्नातक. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ और कानपुर में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक पद पर आसीन।


प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, हाइकू, व्यंग्य एवं बाल कविता इत्यादि विधाओं में लेखन. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, वर्तमान साहित्य, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारतीय, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, गिरिराज, पंजाब सौरभ, अकार, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, युग तेवर, शेष, अक्सर, अलाव, इरावती, उन्नयन, भारत-एशियाई साहित्य, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, अजीत समाचार, लोकायत, शुक्रवार, इण्डिया न्यूज, द सण्डे इण्डियन, छपते-छपते, प्रगतिशील आकल्प, युगीन काव्या, आधारशिला, साहिती सारिका, परती पलार, वीणा, पांडुलिपि, समय के साखी, नये पाठक, सुखनवर, प्रगति वार्ता, प्रतिश्रुति, झंकृति, तटस्थ, मसिकागद, शुभ तारिका, सनद, चक्रवाक, कथाचक्र, नव निकष, हरसिंगार, अभिनव कदम, सबके दावेदार, शिवम्, लोक गंगा, आकंठ, प्रेरणा, सरस्वती सुमन, संयोग साहित्य, शब्द, योजना, डाक पत्रिका, भारतीय रेल, अभिनव, प्रयास, अभिनव प्रसंगवश, अभिनव प्रत्यक्ष, समर लोक, शोध दिशा, अपरिहार्य, संवदिया, वर्तिका, कौशिकी, अनंतिम, सार्थक, कश्फ, उदंती, लघुकथा अभिव्यक्ति, गोलकोंडा दर्पण, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, दक्षिण भारत, केरल ज्योति, द्वीप लहरी, युद्धरत आम आदमी, बयान, हाशिये की आवाज, अम्बेडकर इन इण्डिया, दलित साहित्य वार्षिकी, आदिवासी सत्ता, आश्वस्त, नारी अस्मिता, बाल वाटिका, बाल प्रहरी, बाल साहित्य समीक्षा इत्यादि में रचनाओं का प्रकशन।

इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं-अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, लेखनी, कृत्या, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, हमारी वाणी, लिटरेचर इंडिया, कलायन इत्यादि इत्यादि सहित ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन. व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. इंटरनेट पर 'कविता कोश' में भी कविताएँ संकलित. 50 से अधिक पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित. आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर, Red FM कानपुर और दूरदर्शन पर कविताओं, लेख, वार्ता और साक्षात्कार का प्रसारण।

अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित- 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह,2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years' (2006) एवं 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' . व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा' (सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित. सिद्धांत: Doctrine (कानपुर) व संचार बुलेटिन (लखनऊ) अंतराष्ट्रीय शोध जर्नल में संरक्षक व परामर्श सहयोग। ‘साहित्य सम्पर्क’ (कानपुर) पत्रिका में सम्पादन सहयोग। ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन। विभिन्न स्मारिकाओं का संपादन।


विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त। अभिरूचियों में रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन इत्यादि शामिल।

बकौल पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज' - ‘श्री कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’

Saturday, December 3, 2011

डाक विभाग का बैंक खोलने पर विचार

नई दिल्ली। डाक विभाग ने डाक बैंक खोलने के एक प्रस्ताव पर केंद्रीय वित्त मंत्रालय का विचार मांगा है। साथ ही विभाग ने देश भर में प्रमुख डाकघरों में 1,000 एटीएम स्थापित करने का भी फैसला किया है।
 
केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री सचिन पायलट ने इस सप्ताह के शुरू में लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि डाक विभाग को हैदराबाद स्थिति एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया का एक अध्ययन मिला है, जिसमें कहा गया है कि डाक बैंक खोला जा सकता है। विभाग ने वित्त मंत्रालय से इस पर विचार मांगा है।
 
उन्होंने कहा कि विभाग ने देश भर के प्रमुख डाक घरों में 1,000 एटीएम खोलने का फैसला किया है, इससे सभी दिन 24 घंटे रकम निकाली जा सकेगी।
 
पायलट ने यह भी कहा कहा कि योजना आयोग ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में पोस्ट बैंक की सम्भावना पर अध्ययन के लिए पांच करोड़ रुपये की राशि को मंजूरी दी है।

साभार : जागरण

Thursday, December 1, 2011

डाक घरों की बचत योजनाएं अब और भी आकर्षक

डाकघर अभी भी भारत में बचत के लिए सबसे मुफीद और सुरक्षित माने जाते हैं. रिजर्व बैंक द्वारा बचत खाते की ब्याज दरों को नियंत्रण मुक्त करने के बाद डाकघरों के बचत खातों में लोगों का उत्साह कम होने लगा था। इसे देखते हुए इन खातों की ब्याज दर बढ़ाने की मांग होने लगी थी। गौरतलब है कि ये बचत योजनाएं सरकार के उधारी कार्यक्रम में अहम भूमिका अदा करती हैं। पिछले साल रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर श्यामला गोपीनाथ की अध्यक्षता वाली समिति ने भी डाकघर के बचत खातों में ब्याज की दर को बैंकों के बराबर लाने की सिफारिश की थी। लघु बचत योजनाओं के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य सेफ़िलहाल इस सम्बन्ध में नए दिशा-निर्देश 1 दिसंबर, 2011 से लागू हो गए हैं.

1 दिसंबर, 2011 से सरकार ने डाकघर बचत खाते पर ब्याज दर 3.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। इसी प्रकार मासिक आय योजना व लोक भविष्य निधि (पीपीएफ) पर क्रमश: 8.2 प्रतिशत और 8.6 प्रतिशत सालाना दर से ब्याज मिलेगा।मासिक आय योजना की परिपक्वता अवधि को भी 6 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है। अब मासिक आय योजना पर मिलने वाला बोनस ख़त्म कर दिया गया है. साथ ही पीपीएफ योजना में आयकर अधिनियम की धारा 80-सी के तहत कर छूट के दायरे में आने वाले निवेश की सीमा को भी 70 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दिया है. पीपीएफ में निवेश की बढ़ी सीमा चालू वित्त वर्ष से प्रभावी हो गई है. इसके अलावा अब हर वित्त वर्ष के लिए ब्याज दर को एक अप्रैल से पहले अधिसूचित कर दिया जाएगा.लेकिन इसके साथ ही पीपीएफ के तहत ऋण पर ब्याज दर एक प्रतिशत से बढ़ाकर दो प्रतिशत कर दिया गया है।

सावधि योजनाओं में एक वर्ष की सावधि जमा पर सबसे ज्यादा ब्याज बढ़ाया गया है। इसे 6.25 से 7.7 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीँ दो, तीन और पाँच वर्ष की सावधि जमा योजनाओं पर अब क्रमश: 7.8, 8.0 और 8.3 प्रतिशत ब्याज मिलेगा. 5 वर्षीय आवर्ती खाते पर 10 रूपये प्रतिमाह के अनुपात में कुल 738.62 रूपये मिलेंगें.

किसान विकास पत्र को 1 दिसंबर, 2011 से बंद कर दिया गया है। वहीँ राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी) की परिपक्वता अवधि को 6 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है। अब 100 रूपये के राष्ट्रीय बचत पत्र पर 5 साल में ब्याज सहित 150.90 रूपये मिलेंगें. अब 10-वर्षीय राष्ट्रीय बचत पत्र भी आरंभ हो गए हैं, इस पर 8.7 फ़ीसदी ब्याज मिलेगा. अर्थात 100 रूपये के मूल्य पर 10 साल की परिपक्वता अवधि पश्चात् ब्याज सहित 234.35 रूपये मिलेंगें.