Monday, December 27, 2010

वो खत के पुरजे


कितना सुहाना दौर हुआ करता था, जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।

खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था, तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है, क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी, और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे, जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।

पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था, और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता– कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं ।

और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।

खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय, वरना तो शामत आई समझो ।

अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है, हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो । आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।

आज भी मेरे पास कुछ खत है जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने) और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।

साभार : अपर्णा त्रिपाठी - पलाश

Thursday, December 16, 2010

जिंदगी का लेटर बाक्स


इंतजार कर रहा हूँ
वर्षों से......
दोस्तों के खतों का
नाते-रिश्तेदारों के हाल-समाचार का
महसूसना चाहता हूँ फिर से
सजीव संबंधों की गर्माहट को

लेटर बाक्स से मिलता है सिर्फ
बिजली का बिल
काॅरपोरेशन का टैक्स
बैंक का स्टेटमेंट
या फिर
विज्ञापन के निर्जीव पर्चे !!

राज्यवर्धन
सचिव प्रलेस (पश्चिम बंगाल), एकता हाईट्स,

ब्लाक-2/11 ई0, 56,राजा एस. सी. मल्लिक रोड, कोलकाता-700032

Sunday, December 12, 2010

सोने के डाक टिकट


(आज 12 दिसंबर, 2010 के जनसत्ता अख़बार के रविवारी पृष्ठ पर 'सोने के डाक टिकट' शीर्षक से मेरा एक लेख प्रकाशित है. आप इस लेख को यहाँ भी पढ़ सकते हैं. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा)

डाक टिकटों के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन सोने के डाक-टिकट की बात सुनकर ताज्जुब होता है। हाल ही में भारतीय डाक विभाग ने 25 स्वर्ण डाक टिकटों का एक संग्रहणीय सेट जारी किया है। इसके लिए राष्ट्रीय फिलेटलिक म्यूजियम (नई दिल्ली) के संकलन से 25 ऐतिहासिक व विशिष्ट डाक टिकट इतिहासकारों व डाक टिकट विशेषज्ञों द्वारा विशेष रूप से भारत की अलौकिक कहानी का वर्णन करने के लिए चुने गए हैं, ताकि भारत की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी धरोहरों की जानकारी दी जा सके और महापुरूषों को सच्ची श्रद्धांजलि।

सोने के इन डाक टिकटों को जारी करने के लिए डाक विभाग ने लंदन के हाॅलमार्क ग्रुप को अधिकृत किया है। हाॅलमार्क ग्रुप द्वारा हर चुनी हुई कृति के अनुरूप विश्व प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा समान आकार व रूप के मूल टिकट के अनुरूप ही ठोस चांदी में डाक टिकट ढाले गये हैं और उन पर 24 कैरेट सोने की परत चढ़ायी गयी है। ‘‘प्राइड आफ इण्डिया‘‘ नाम से जारी किये गए ये डाक टिकट डायमण्ड कट वाले छिद्र के साथ 2.2 मि0मी0 मोटा है। 25 डाक टिकटों का यह पूरा सेट 1.5 लाख रूपये का है यानि हर डाक टिकट की कीमत 6,000 रूपये है। इन डाक टिकटों के पीछे भारतीय डाक और हाॅलमार्क का लोगो है।

इन 25 खूबसूरत डाक टिकटों में स्वतंत्र भारत का प्रथम डाक टिकट ‘जयहिन्द‘, थाणे और मुंबई के बीच चली पहली रेलगाड़ी पर जारी डाक टिकट, भारतीय डाक के 150 साल पर जारी डाक टिकट, 1857 के महासंग्राम के 150वें साल पर जारी डाक टिकट, प्रथम एशियाई खेल (1951), क्रिकेट विजय-1971, मयूर प्रतिरूप: 19वीं शताब्दी मीनाकारी, राधा किशनगढ़, कथकली, भारतीय गणराज्य, इण्डिया गेट, लालकिला, ताजमहल, वन्देमातरम्, भगवदगीता, अग्नि-2 मिसाइल पर जारी डाक टिकट शामिल किये गये हैं। इनके अलावा महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, जे.आर.डी.टाटा, होमी जहांगीर भाभा, मदर टेरेसा, सत्यजित रे, अभिनेत्री मधुबाला और धीरूभाई अम्बानी पर जारी डाक टिकटों की स्वर्ण अनुकृति भी जारी की जा रही है।

भूटान ने 1996 में 140 न्यू मूल्य वर्ग का ऐसा विशेष डाक टिकट जारी किया था जिसके मुद्रण में 22 कैरेट सोने के घोल का उपयोग किया गया था। विश्व के पहले डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक‘ के सम्मान में जारी किये गये इस टिकट पर ‘22 कैरेट गोल्ड स्टेम्प 1996‘ लिखा है। इस टिकट की स्वर्णिम चमक को देखकर इसकी विश्वसनीयता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। यह खूबसूरत डाक टिकट अब दुर्लभ डाक टिकटों की श्रेणी में माना जाता है क्योंकि अब यह आसानी से उपलब्ध नहीं है।

भारतीय डाक विभाग ने हाॅलमार्क ग्रुप के साथ जारी किये जा रहे इन डाक टिकटों के बारे में सबसे रोचक तथ्य यह है कि ये स्वर्ण डाक टिकट डाकघरों में उपलब्ध नहीं हैं और न ही किसी शोरूम में। इन्हें प्राप्त करने के लिए विशेष आर्डर फार्म भर कर हाॅलमार्क को भेजना होता है। इसके साथ संलग्न विवरणिका जो इसकी खूबसूरती की व्याख्या करती है, आपने आप में एक अनूठा उपहार है। साथ ही वैलवेट लगी एक केज, ग्लब्स व स्विस निर्माणकर्ता द्वारा सत्यापित शुद्धता का प्रमाण पत्र इन डाक टिकटों को और भी संग्रहणीय बनाते हैं। इन डाक टिकटों की ऐतिहासिकता बरकरार रखने और इन्हें मूल्यवान बनाने के लिए सिर्फ 7,500 सेट ही जारी किया गया है।

सोने के ये डाक टिकट न सिर्फ डाक टिकट संग्रहकर्ताओं बल्कि अपनी सभ्यता व संस्कृति से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक अमूल्य धरोहर हैं. इसीलिए डाक टिकटों के पहले सेट को नई दिल्ली के राष्ट्रीय फिलेटलिक म्यूजियम में भी प्रदर्शन के लिए सुरक्षित रखने का फैसला किया गया है ।

Thursday, December 9, 2010

गौरैया और कबूतर के साथ उडेंगी चिट्ठियाँ

भारतीय डाक विभाग ने 9 जुलाई सन 2010 को गौरैया व कबूतर पर डाक टिकट जारी किए। गौरैया व कबूतर हमारी संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा रहे हैं, लोकजीवन में इनसे जुड़ी कहानियां व गीत आप को लोक साहित्य में मिलेंगें। इधर कुछ वर्षों से पक्षी वैज्ञानिकों एंव सरंक्षणवादियों का ध्यान घट रही गौरैया की तरफ़ गया। नतीजतन इसके अध्ययन व सरंक्षण की बात शुरू हुई, जैसे की पूर्व में गिद्धों व सारस के लिए हुआ। डाक टिकटों में एक नर व मादा गौरैया को एक मिट्टी के घड़े पर बैठे हुए दर्शाया गया है, दूसरे सेट में कबूतरों का एक जोड़ा चित्रित है। एक डाक टिकट की कीमत पाँच रुपये हैं। जो पूरे भारत में आप के पत्र को पहुंचाने में सक्षंम हैं.डाक टिकटों को इकट्ठा करने वाले लोगों के संग्रह में कबूतर और गौरैया की तस्वीर वाले डाक टिकटों की बढ़ोत्तरी हो सकेगी।पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह एक सुखद अनुभव होगा जब वह गौरैया या कबूतर वाले डाक टिकट लगे पत्रों को प्राप्त करेंगे या किसी को भेजेंगे।

हांलाकि ई-मेल व मोबाइल ने चिठ्ठियों के चलन को काफ़ी हद तक कम किया हैं, लेकिन हाथ से लिखे खत और उन पर चिपके हुए रंग-बिरंगी तस्वीरों वाले टिकट मानव मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं, साथ ही वह खत व टिकट लिफ़ाफ़े हमारे अतीत की यादों को सुरक्षित रखने में भी मदद करते हैं। क्योंकि जब भी आप इन धूल चढ़े लिफ़ाफ़ों से वह परत हटायेंगे तो बरबस ही वह पुराना वक्त और वह बाते ताजा होंगी जो इस खत में लिखी हुई हैं। खास बात है कि कागज के यह खत जो कहते हैं, उस बात का पालन करने के लिए हम अधिक तत्पर व संवेदनशील होते हैं। वह प्रभाव इलेक्ट्रानिक संपर्क के किसी माध्यम में मौजूद नही हैं।

इसलिए इस बार जब आप किसी को खत लिखे तो गौरैया व कबूतर वाले टिकट लगाना मत भूलिएगा, और यह भी जरूर लिखिएगा कि हमारें घरों व उनके आस-पास रहने वाले इन खूबसूरत परिन्दों के खाने-पीने का खयाल रखते है या नही।

साभार :दुधवा लाइव डेस्क

Saturday, December 4, 2010

डाक टिकट बनीं पत्र मित्रता

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी संग्रह करना बहुत से बच्चों की हॉबी का हिस्सा होता है, कोई अखबार में छपी रेसीपीज तो कोई विभिन्न देशों की मुद्राएं इकटी करने में लगा रहता है। डाक-टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौकों में से एक है। डाक-टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने को प्रेरित करता है, इसलिए इसे प्राकृतिक शिक्षा-उपकरण कहा जाता है। डाक-टिकट किसी भी देश की विरासत की चित्रमय कहानी हैं। डाक टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक देशों के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, ऎतिहासिक घटनाएं, भाषाएं, मुद्राएं, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवनशैली एवं देश के महारथियों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

डाक टिकट का इतिहास
डाक-टिकट का इतिहास करीब 169 साल पुराना है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था, जिसके ऊपर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। एक पेनी मूल्य के इस टिकट के किनारे सीधे थे यानी टिकटों को अलग करने के लिए जो छोटे छोटे छेद बनाए जाते हैं, वे प्राचीन डाक टिकटों में नहीं थे। इस समय तक उनमें लिफाफे पर चिपकाने के लिए गोंद भी नहीं लगा होता था। इसके उपयोग का प्रारंभ 6 मई 1840 से हुआ। टिकट संग्रह करने में रूचि रखने वालों के लिए इस टिकट का बहुत महत्व है, क्योंकि इस टिकट से ही डाक-टिकट संग्रह का इतिहास भी शुरू होता है।

भारत में पहला डाक-टिकट
1 जुलाई 1852 में सिंध प्रांत में जारी किया गया, जो केवल सिंध प्रांत में उपयोग के लिए सीमित था। आधे आने मूल्य के इस टिकट को भूरे कागज पर लाख की लाल सील चिपका कर जारी किया गया था। यह टिकट बहुत सफल नहीं रहा क्योंकि लाख टूटकर झड़ जाने के कारण इसको संभालकर रखना संभव नहीं था। फिर भी ऎसा अनुमान किया जाता है कि इस टिकट की लगभग 100 प्रतियां विभिन्न संग्रहकर्ताओं के पास सुरक्षित हैं। डाक-टिकटों के इतिहास में इस टिकट को सिंध डाक के नाम से जाना जाता है। बाद में सफेद और नीले रंग के इसी प्रकार के दो टिकट वोव कागज पर जारी किए गए लेकिन इनका प्रयोग बहुत कम दिनों तक रहा, क्योंकि 30 सितंबर 1854 को सिंध प्रांत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार होने के बाद इन्हें बंद कर दिया गया।ये एशिया के पहले डाक-टिकट तो थे ही, विश्व के पहले गोलाकार टिकट भी थे। संग्रहकर्ता इस प्रकार के टिकटों को महत्वपूर्ण समझते हैं और आधे आने मूल्य के इन टिकटों को आज सबसे बहुमूल्य टिकटों में गिनते हैं।

डाकटिकट संग्रह बना मनोरंजन
समय के साथ जैसे-जैसे टिकटों का प्रचलन बढ़ा टिकट संग्रह का शौक भी पनपने लगा। 1860 से 1880 के बीच बच्चों और किशोरों ने टिकटों का संग्रह करना शुरू कर दिया था। दूसरी ओर अनेक वयस्क लोगों में भी यह शौक पनपने लगा और उन्होंने टिकटों को जमा करना शुरू किया, संरक्षित किया, उनके रेकार्ड रखे और उन पर शोध आलेख प्रकाशित किए। जल्दी ही इन संरक्षित टिकटों का मूल्य बढ़ गया क्योंकि इनमें से कुछ तो ऎतिहासिक विरासत बन गए थे और बहुमूल्य बन गए थे। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अन्य कई देशों द्वारा डाक-टिकट जारी किये गए।

1920 तक यह टिकट संग्रह का शौक आम जनता तक पहुंचने लगा। उनको अनुपलब्ध तथा बहुमूल्य टिकटों की जानकारी होने लगी और लोग टिकट संभालकर रखने लगे। नया टिकट जारी होता तो उसे खरीदने के लिए डाकघर पर भीड़ लगनी शुरू हो जाती थी। लगभग 50 वर्षो तक इस शौक का नशा जारी रहा। इसी समय टिकट संग्रह के शौक पर आधारित टिकट भी जारी किए गए। जर्मनी के टिकट में टिकटों के शौकीन एक व्यक्ति को टिकट पर अंकित बारीक अक्षर आवर्धक लेंस (मैग्नीफाइंग ग्लास) की सहायता से पढ़ते हुए दिखाया गया है। आवर्धक लेंस टिकट-संग्रहकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। एक रूपये मूल्य का भारतीय टिकट, यू.एस. का टिकट तथा बांग्लादेश के लाल रंग के तिकोने टिकटों का एक जोड़ा टिकट संग्रह के शौक पर आधारित महत्वपूर्ण टिकटों में से हैं।

1940-50 तक डाक-टिकटों के शौक ने देश-विदेश के लोगों को मिलाना शुरू कर दिया था। टिकट इकटा करने के लिए लोग पत्र-मित्र बनाते थे। अपने देश के डाक-टिकटों को दूसरे देश के मित्रों को भेजते थे और दूसरे देश के डाकटिकट मंगवाते थे। पत्र-मित्रता के इस शौक से डाक-टिकटों का आदान प्रदान तो होता ही था लोग विभिन्न देशों के विषय में अनेक ऎसी बातें भी जानते थे, जो किताबों में नहीं लिखी होती हैं। उस समय टीवी और आवागमन के साधन आम न होने के कारण देश विदेश की जानकारी का ये बहुत ही रोचक साधन बने। पत्र-पत्रिकाओं में टिकट से संबंधित स्तंभ होते और इनके विषय में बहुत सी जानकारियों को जन सामान्य तक पहुंचाया जाता। पत्र-मित्रों के पतों की लंबी सूचियां भी उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित की जाती थीं।

धीरे धीरे डाक टिकटों के संग्रह की विभिन्न शैलियों का भी जन्म हुआ। लोग इसे अपनी जीवन शैली, परिस्थितियों और रूचि के अनुसार अनुकूलित करने लगे। इस परंपरा के अनुसार कुछ लोग एक देश या महाद्वीप के डाक-टिकट संग्रह करने लगे तो कुछ एक विषय से संबंधित डाक-टिकट। आज अनेक लोग इस प्रकार की शैलियों का अनुकरण करते हुए और अपनी-अपनी पसंद के किसी विशेष विषय के डाक टिकटों का संग्रह करके आनंद उठाते है। विषयों से संबंधित डाक टिकटों के संग्रह में अधिकांश लोग पशु, पक्षी, फल, फूल, तितलियां, खेलकूद, महात्मा गांधी, महानुभावों, पुल, इमारतें आदि विषयों और दुनिया भर की घटनाओं के रंगीन और सुंदर चित्रों से सजे डाक टिकटों को एकत्रित करना पसंद करते है।

प्रत्येक देश हर साल भिन्न भिन्न विषयों पर डाक-टिकट जारी करते हैं और जानकारी का बड़ा खजाना विश्व को सौप देते हैं। इस प्रकार किसी विषय में गहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए उस विषय के डाक टिकटों का संग्रह करना एक रोचक अनुभव हो सकता है। डाक-टिकट संग्रह का शौक हर उम्र के लोगों को मनोरंजन प्रदान करता है। बचपन में ज्ञान एवं मनोरंजन, वयस्कों में आनंद और तनावमुक्ति तथा बड़ी उम्र में दिमाग को सक्रियता प्रदान करने वाला इससे रोचक कोई शौक नहीं। इस तरह सभी पीढियों के लिए डाक टिकटों का संग्रह एक प्रेरक और लाभप्रद अभिरूचि है।

Thursday, December 2, 2010

डाक टिकटों में भारत दर्शन

प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की मुखिया श्रीमती सोनिया गांधी को उनकी इलाहाबाद यात्रा के दौरान 25 नवंबर 2010 को वरिष्ठ पत्रकार और रेल मंत्रालय में परामर्शदाता अरविंद कुमार सिंह ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक डाक टिकटों में भारत दर्शन की प्रथम प्रति भेंट की। इस अवसर पर उन्होंने श्रीमती सोनिया गांधी को यह भी जानकारी दी कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में शामिल रहे सेनानियों तथा कांग्रेस के 278 नेताओं पर अब तक भारत में डाक टिकट जारी हो चुके हैं। पर इन सभी डाक टिकटों में पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद जारी डाक टिकट सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक माना जाता है जो इलाहाबाद में ही उ.प्र. की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने 12 जून 1964 को जारी किया था। यह डाक टिकट दो करोड़ की संख्या में छपा था और दुनिया के तमाम हिस्सों में लोकप्रिय रहा था। आज तक किसी भी व्यक्तित्व पर इतनी बड़ी संख्या में डाक टिकट नहीं जारी हुए।

श्री सिंह की यह पुस्तक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया (भारत सरकार) द्वारा प्रकाशित की गयी है और इसमें डाक टिकटों से संबंधित सभी पक्षों पर महत्वपूर्ण जानकारियां देने के साथ देश के सभी प्रमुख फिलैटलिस्ट, फिलैटली संस्थाओं आदि का भी विवरण दिया गया है। इसके अलावा उनकी एक और पुस्तक भारतीय डाक भी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा हिंदी में प्रकाशित की गयी है जिसका उर्दू, अंग्रेजी तथा असमिया भाषा में प्रकाशन किया जा चुका है और इसका एक खंड एनसीईआरटी द्वारा आठवीं कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम वसंत भाग-3 में भी शामिल किया गया है।

श्री सिंह ने इलाहाबाद में जनसत्ता के संवाददाता के रूप में अपना कैरियर 1983 में शुरू किया था और 1986 के बाद दिल्ली में चौथी दुनिया, अमर उजाला में लंबे समय तक कार्य करने के बाद हरिभूमि के दिल्ली संस्करण के संपादक समेत कई पदों पर कार्य किया। राष्ट्रपति तथा अकादमी पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित श्री सिंह संप्रति रेल मंत्रालय में परामर्शदाता हैं।

साभार : हिन्दीलोक

भारतीय डाक विभाग ट्विटर पर

दो सरकारी महकमों के प्रति बचपन से बहुत ही आकर्षण रहा है – रेल और डाक । आकर्षण अभी भी है। हांलाकि इन दो महान सेवाओं पर कई आक्रमण शुरु हो गये हैं ।

काशी के राजघाट किले स्थित साधना केन्द्र परिसर में मेरा शैशव बीता । इस परिसर की दो तरफ़ गंगा-वरुणा बहती हैं और तीसरी ओर काशी स्टेशन है। गंगा-वरुणा की भांति काशी स्टेशन से भी हमारी वानर-सेना का आकर्षण था। माल-गोदाम और स्टेशन पर मटर-गश्ती खूब होती थी। माल-वाहक डिब्बों को माल गोदाम में छोड़ने और ले जाने के लिए इंजन की शन्टिंग दिन भर होती । आम तौर पर कुकुर-मुँहा कोयले के इंजन यह काम करते । बिलार-मुँहा इंजन आम तौर पर एक्सप्रेस गाड़ियों में लगे होते। इंजन ड्राईवर और गार्ड अत्यन्त श्रद्धा और आकर्षण के पात्र होते। इंजन ड्राइवरों द्वारा रुमाल गँठिया कर टोपी बनाने की दो शैलियों पर गौर किया था लेकिन सीख एक ही पाये थे- रुमाल के चारों कोनों को गँठियाने वाली शैली। माल-गोदाम में शन्टिंग करने वाले इंजनों के ड्राइवर बहुत प्यासी दृष्टि से हम ताकते। कभी वे खुद पूछते,’ क्या बात है?’ -’ऊपर चढ़ कर अन्दर से इंजन देखना है।’ बेलचे से एक सधी हुई लय में कोयला उठाना और उसे धधकती भट्टी में डालना,भांप के दबाव की घड़ी पर ध्यान रखना, बाहर की तरफ़ लटक कर जायजा लेना,गोल हैण्डल घुमाकर इंजन को आगे या पीछे ले जाना ! गार्ड के डिब्बे से भी बहुत आकर्षण था।

दरजा चार से रिश्तेदारों को ख़त लिखने की माँ ने आदत डलवाई थी। यह झेलाऊ इसलिए नहीं लगता था कि उनके जवाब पा कर मानो पर लग जाते थे। हमारे स्कूल में भी सप्ताह में एक दिन हॉ्स्टल में रहने वाले लड़के-लड़कियों को क्लास में पोस्ट कार्ड दिए जाते थे। घर वालों को लिखने के लिए। शुरु में उन पर स्केल से लाईन खींच कर तब लिखा जाता। डाक-पेटी से डाकिए द्वारा पत्र निकालना , निकट के डाकघर में आने जाने वाली चिट्ठियों की छँटाई,बाहर से आई चिट्ठियों का वितरण इस पूरी प्रक्रिया को बहुत गौर से देखा समझा था। दरअसल एक छोटी सी किताब थी जिसमें अत्यन्त रोचक शैली में पूरी प्रक्रिया का सचित्र विवरण था। अपनी चिट्ठी डाक पेटी में डाल देने के बाद जब डाकिया पेटी को अपनी खाकी बोरी में खाली कर रहा होता है तो बच्चा उत्तेजित होकर माँ से कहता है-’देखो माँ, मेरी चिट्ठी भी यह आदमी चुराकर ले जा रहा है’। डाक घर के अन्दर के कमरे में एक गड्ढे में एक तिजोरी हुआ करती थी। बड़े डाक खाने से लाई गई सामग्री और नगद उसमें रखा होता था । इसके साथ उस तिजोरी में एक छुरा देखा था जिसमें दो घुँघरू लगे थे। इसका रहस्य तो कोई सुधी पाठक बतायेगा ।

मेरे गुरु का कहना था कि जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की सरकार यदि ठान लेगी तो उससे ही रोजगार का सृजन होगा। इस प्रकार पैदा रोजगार ’गड्ढ़े खोद कर उसे पाटने’ वाले काम जैसे नहीं होते। आज भी भारतीय डाक विभाग में डाकियों की भर्ती की जा सकती है। देश के कई गाँवों में हफ़्ते-पखवारे में एक बार डाक आती है,कई बार गाँव का कोई व्यक्ति हफ़्ते-पन्द्रह दिन में एक बार निकट के डाकखाने से पत्र ले आता है । देश की जनता की कपड़े की जरूरत को पूरा करने का मन यदि सरकार बना ले तो उसे हैण्डलूम को प्राथमिकता देनी होगी। पूरे देश को शिक्षित करने के लिए आज भी शिक्षकों की बहाली की गुंजाइश है। जब सभी सेवायें-सुविधाएं मुट्ठी-भर लोगों को ही मुहैय्या करने की नीति हो तब तमाम जरूरी रोजगार के अवसरों को समाप्त किया जाता है। सुना है बरसों से डाकियों की नियुक्ति बन्द है।

पिछले कुछ समय से डाक विभाग में रंग-रोगन ,ताम झाम में कुछ चमक-दमक बढ़ी है। डाकियों की संख्या नहीं बढ़ानी है।

हिन्दी में दो ब्लॉग डाक-डाकिया-डाक घर से जुड़े हैं – भारतीय डाक सेवा से जुड़े कृष्ण कुमार यादव ’डाकिया डाक लाया’ नामक ब्लॉग चलाते हैं तथा पप्पू ’डाकखाना’ नामक ब्लॉग चलाते हैं । निश्चित तौर पर हिन्दी ब्लॉग जगत को एक व्यापक आधार देने में इन दोनों चिट्ठों की अहम भूमिका मानी जाएगी। युनुस खान द्वारा शुरु किए गए रेडियोनामा नामक समूह चिट्ठे से इन दोनों चिट्ठों की तुलना की जा सकती है ।

भारतीय डाक विभाग ने पोस्ट ऑफ़िस इंडिया नाम से ट्विटर पर खाता खोला है । ट्विटर पर इस महकमे से जुड़कर हम इस पर हिन्दी को बढ़ा सकते हैं। डाक खानों में टंगी- ’शब्दों के लिए अटिकिए नहीं ,हिन्दी लिखते- लिखते आयेगी’ तख्ती को याद करें और डाक विभाग को हिन्दी में ट्विट करें !!

Sunday, October 17, 2010

विजयदशमी की बधाई !!


दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।....विजयदशमी की हार्दिक बधाई !!

Wednesday, October 13, 2010

अंडमान में मनाया गया विश्व डाक दिवस

भारतीय डाक विभाग द्वारा विश्व डाक दिवस प्रधान डाकघर पोर्टब्लेयर में मनाया गया और इस दौरान राष्ट्रीय डाक सप्ताह का आयोजन 9 अक्टूबर-15 अक्टूबर के दौरान किया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए अंडमान निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि 9 अक्टूबर 1874 को ‘‘जनरल पोस्टल यूनियन‘‘ (वर्तमान में यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन या विश्व डाक संघ) के गठन हेतु बर्न, स्विटजरलैण्ड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया था, इसी कारण 9 अक्टूबर को कालान्तर में ‘‘विश्व डाक दिवस‘‘ के रूप में मनाना आरम्भ किया गया। यह संधि 1 जुलाई 1875 को अस्तित्व में आयी, जिसके तहत विभिन्न देशों के मध्य डाक का आदान-प्रदान करने संबंधी रेगुलेसन्स शामिल थे। कालान्तर में 1 अप्रैल 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम परिवर्तित कर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन कर दिया गया। यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत प्रथम एशियाई राष्ट्र था, जो कि 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बना। जनसंख्या और अन्तर्राष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर उस समय सदस्य राष्ट्रों की 6 श्रेणियां थीं और भारत आरम्भ से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा। 1947 में यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशिष्ट एजेंसी बन गई। श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस रोचक तथ्य की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया कि विश्व डाक संघ के गठन से पूर्व दुनिया में एक मात्र अन्तर्राष्ट्रीय संगठन रेड क्रास सोसाइटी (1870) था।

इस अवसर पर प्रीमियम सेवाओं से संबंधित कारपोरेट कस्टमर मीट/बिजनेस मीट का आयोजन हुआ । विभिन्न प्रीमियम सेवाओं मसलन- स्पीड पोस्ट, एक्सप्रेस पार्सल पोस्ट, बिजनेस पोस्ट, बिल मेल सर्विस, डायरेक्ट पोस्ट, मीडिया पोस्ट, ई-पोस्ट, ई-पेमेण्ट, लाजिस्टिक पोस्ट, फ्री पोस्ट और इलेक्ट्रानिक इंटीमेशन आॅफ डिलीवरी इत्यादि के संबंध में जानकरी दी गई। डाक सेवा निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने संबोधित करते हुए कहा कि व्यवसायिकता के इस दौर में बिना स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा के कोई भी संगठन उन्नति नहीं कर सकता और डाक विभाग भी इस क्षेत्र में तमाम नये कदम उठा रहा है। डाक विभाग जहाँ नित् नई सेवायें लागू कर रहा है, विभाग ने अपनी परम्परागत छवि को प्रतिस्पर्धा के तहत कारपोरेट इमेज में तब्दील किया है।घर-घर जाकर डाकियों द्वारा डाक का एकत्रीकरण, वन इण्डिया-वन रेट के तहत स्पीड पोस्ट सेवा दरों में कमीं, इन्स्टेन्ट मनी आर्डर, सभी बचत सेवाओं हेतु फाइनेन्स मार्ट, विभिन्न कम्पनियों के म्युचुअल फण्ड व बीमा उत्पादों की बिक्री, कम्प्यूटराइजेशन व प्रोजेक्ट एरो के तहत डाकघरों का आधुनिकीकरण व नवीनतम टेक्नोलाजी का प्रयोग जैसे तमाम कदमों ने डाकघरों का चेहरा बदल डाला है। श्री यादव ने कहा कि एक तरफ विभिन्न कारपोरेट एवं सरकारी व अद्र्व सरकारी विभागों की आवश्यकतानुसार तमाम सेवायें आरम्भ की गई हैं, वहीं बुक नाउ-पे लेटर, बल्क मेल पर छूट, फ्री पिकअप जैसी स्कीमों के तहत डाक सेवाओं को और आकर्षक बनाया गया है। श्री यादव ने कहा कि नेटवर्क की दृष्टि से डाकघर बचत बैंक देश का सबसे बड़ा रीटेल बैंक (लगभग 1.5 लाख शाखाओं, खातों और वार्षिक जमा-राशि का संचालन, 31 मार्च 2007 को कुल जमा राशि-3,515,477.2 मिलियन रूपये) है। यह अनुमान लगाया गया था कि वर्ष 2001 में डाकघर में बचत की कुल राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7 प्रतिशत बनती है। (विश्व बैंक अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट, अगस्त, 2002)। 172 मिलियन से अधिक खाताधारकों के ग्राहक आधार और 1,54,000 शाखाओं के नेटवर्क के साथ डाकघर बचत बैंक देश के सभी बैंकों की कुल संख्या के दोगुने के बराबर है।

श्री यादव ने कहा कि डाक विभाग अपने ग्राहकों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए लोगों से संवाद कायम करना बेहद जरूरी है। इस परिप्रेक्ष्य में प्रोजेक्ट एरो के तहत जहां विभाग ने कोर सेक्टर पर ध्यान दिया है वहीं स्टाफ को ग्राहकों से अच्छे व्यवहार हेतु भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। इस अवसर पर उन संस्थानों के प्रतिनिधियों का भी सम्मान किया गया, जो कि डाक विभाग को लाखों में व्यवसाय देते हैं। इनमें एक्सीस बैंक के हेड श्री प्रकाश कुमार, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के निदेशक श्री एस0 सौनन्द, भारतीय स्टेट बैंक के चीफ मैनेजर श्री देबदास चट्टोपाध्याय और वेतन एवं लेखा कार्यलय के निदेशक श्री एन0एम0 पिल्लै शामिल हैं

इस अवसर पर उपस्थित जनों का स्वागत श्री एम0 गणपति, पोस्टमास्टर, प्रधान डाकघर, पोर्टब्लेयर ने किया तथा श्री रंजीत कुमार आदक, आभार-ज्ञापन सहायक अधीक्षक (मुख्यालय), द्वारा किया गया।

(साभार : द्वीप समाचार, 10 अक्तूबर, 2010)

Saturday, October 9, 2010

अहसास की संजीदगी बरकरार है पत्रों में (‘विश्व डाक दिवस‘ 9 अक्तूबर पर विशेष)

पत्रों की दुनिया बेहद निराली है। दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक यदि पत्र अबाध रूप से आ-जा रहे हैं, तो इसके पीछे ‘यूनिवर्सल पोस्टल‘ यूनियन का बहुत बड़ा योगदान है, जिसकी स्थापना 9 अक्टूबर 1874 को स्विटजरलैंड में हुई थी। यह 9 अक्टूबर पूरी दुनिया में ‘विश्व डाक दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। तब से लेकर आज तक डाक-सेवाओं में वैश्विक स्तर पर तमाम क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं और भारत भी इन परिवर्तनों से अछूता नहीं हैं। संचार क्रान्ति के नए साधनों- टेलीफोन, मोबाइल फोन, इण्टरनेट, फैक्स, वीडियो कान्फं्रेसिंग इत्यादि ने समग्र विश्व को एक ‘ग्लोबल विलेज‘ में परिवर्तित कर दिया। देखते ही देखते फोन नम्बर डायल किया और सामने से इच्छित व्यक्ति की आवाज आने लगी। ई-मेल या एस0एम0एस0 के द्वारा चंद सेकेंडों में अपनी बात दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचा दी। वैश्विक स्तर पर पहली बार 1996 में संयुक्त राज्य अमेरिका में ई-मेल की कुल संख्या डाक सेवाओं द्वारा वितरित पत्रों की संख्या को पार कर गई और ऐसे में पत्रों की प्रासंगिकता पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे।

सभ्यता के आरम्भ से ही मानव किसी न किसी रूप में पत्र लिखता रहा है। दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व का बेबीलोन के खण्डहरों से मिला था, जोकि वास्तव में एक प्रेम पत्र था और मिट्टी की पटरी पर लिखा गया था। कहा जाता है कि बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहाँ से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा-‘‘मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।‘‘ यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिख गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और इसी के साथ पत्रों की दुनिया नेे अपना एक ऐतिहासिक सफर पूरा कर लिया है।

जब संचार के अन्य साधन न थे, तो पत्र ही संवाद का एकमात्र माध्यम था। पत्रों का काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अजीब रहस्य या गोपनीयता, संग्रहणीयता, लेखन कला एवं अतीत को जानने का भाव भी छुपा होता है। पत्रों की सबसे बडी विशेषता इनका आत्मीय पक्ष है। यदि पत्र किसी खास का हुआ तो उसे छुप-छुप कर पढ़ने में एवम् संजोकर रखने तथा मौका पाते ही पुराने पत्रों के माध्यम से अतीत में लौटकर विचरण करने का आनंद ही कुछ और है। यह सही है कि संचार क्रान्ति ने चिठ्ठियों की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया है और पूरी दुनिया को बहुत करीब ला दिया है। पर इसका एक पहलू यह भी है कि इसने दिलों की दूरियाँ इतनी बढ़ा दी हैं कि बिल्कुल पास में रहने वाले अपने इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों की भी लोग खोज-खबर नहीं रखते। ऐसे में युवा पीढ़ी के अंदर संवेदनाओं को बचा पाना कठिन हो गया है। तभी तो पत्रों की महत्ता को देखते हुए एन0सी0ई0आर0टी0 को पहल कर कक्षा आठ के पाठ्यक्रम में ‘‘चिट्ठियों की अनोखी दुनिया‘‘ नामक अध्याय को शामिल करना पड़ा।

पत्र लेखन सिर्फ संचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक सशक्त विधा है। स्कूलों में जब बच्चों को पत्र लिखना सिखाया जाता है तो अनायास ही वे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों या मित्रों को पत्र लिखने का प्रयास करने लगते हैं। पत्र सदैव सम्बंधों की उष्मा बनाये रखते हैं। पत्र लिखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें कोई जल्दबाजी या तात्कालिकता नहीं होती, यही कारण है कि हर छोटी से छोटी बात पत्रों में किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त हो जाती है जो कि फोन या ई-मेल द्वारा सम्भव नहीं है। पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता इनका स्थायित्व है। कल्पना कीजिये जब अपनी पुरानी किताबों के बीच से कोई पत्र हम अचानक पाते हैं, तो लगता है जिन्दगी मुड़कर फिर वहीं चली गयी हो। जैसे-जैसे हम पत्रोें को पलटते हैं, सम्बन्धों का एक अनंत संसार खुलता जाता है। व्यक्ति पत्र तात्कालिक रूप से भले ही जल्दी-जल्दी पढ़ ले पर फिर शुरू होती है-एकान्त की खोज और फिर पत्र अगर किसी खास के हों तो सम्बन्धों की पवित्र गोपनीयता की रक्षा करते हुए उसे छिप-छिप कर बार-बार पढ़ना व्यक्ति को ऐसे उत्साह व ऊर्जा से भर देता है, जहाँ से उसके कदम जमीं पर नहीं होते। वह जितनी ही बार पत्र पढ़ता है, उतने ही नये अर्थ उसके सामने आते हैं।

सिर्फ साधारण व्यक्ति ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी पत्रों के अंदाज को जिया है। माक्र्स-एंजिल्स के मध्य ऐतिहासिक मित्रता का सूत्रपात पत्रों से ही हुआ। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उस स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखा, जिसमें उनका पुत्र अध्ययनरत था। इस पत्र में उन्होंने प्राचार्य से अनुरोध किया था कि उनके पुत्र को वे सारी शिक्षायें दी जाय, जो कि एक बेहतर नागरिक बनने हेतु जरूरी हैं। इसमें किसी भी रूप में उनका पद आडे़ नहीं आना चाहिये। महात्मा गाँधी तो पत्र लिखने में इतने सिद्धहस्त थे कि दाहिने हाथ के साथ-साथ वे बाएं हाथ से भी पत्र लिखते थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी को जेल से भी पत्र लिखते रहे। ये पत्र सिर्फ पिता-पुत्री के रिश्तों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें तात्कालिक राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश का भी सुन्दर चित्रण है। इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व को गढ़ने में इन पत्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज ये किताब के रूप में प्रकाशित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुके हैं। इन्दिरा गाँधी ने इस परम्परा को जीवित रखा एवं दून में अध्ययनरत अपने बेटे राजीव गाँधी को घर की छोटी-छोटी चीजों और तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बारे में लिखती रहीं। एक पत्र में तो वे राजीव गाँधी को रीवा के महाराज से मिले सौगातों के बारे में भी बताती हैं। तमाम राजनेताओं-साहित्यकारों के पत्र समय-समय पर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होते रहते हैं। इनसे न सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के संबंध में जाने-अनजाने पहलुओं का पता चलता है बल्कि तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश के संबंध में भी बहुत सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इसी ऐतिहासिक के कारण आज भी पत्रों की नीलामी लाखों रूपयों में होती हैं।

कहते हैं कि पत्रों का संवेदनाओं से गहरा रिश्ता है और यही कारण है कि पत्रों से जुड़े डाक विभाग ने तमाम प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। सुविख्यात उर्दू समीक्षक पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ कमल किशोर गोयनका , महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी, सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग की गोद में अपनी सृजनात्मक-रचनात्मक काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

भारतीय परिपे्रक्ष्य में इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत एक कृषि प्रधान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाला देश है, जहाँ 70 फीसदी आबादी गाँवों में बसती है। समग्र टेनी घनत्व भले ही 60 का आंकड़ा छूने लगा हो पर ग्रामीण क्षेत्रों में यह बमुश्किल 15 से 20 फीसदी ही है। यदि हर माह 2 करोड़ नए मोबाइल उपभोक्ता पैदा हो रहे हैं तो उसी के सापेक्ष डाक विभाग प्रतिदिन दो करोड़ से ज्यादा डाक वितरित करता है। 1985 में यदि एस0एम0एस0 पत्रों के लिए चुनौती बनकर आया तो उसके अगले ही वर्ष दुतगामी ‘स्पीड पोस्ट‘ सेवा भी आरम्भ हो गई। यह एक सुखद संकेत है कि डाक-सेवाएं नवीनतम टेक्नाॅलाजी का अपने पक्ष में भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। ‘ई-मेल‘ के मुकाबले ‘ई-पोस्ट‘ के माध्यम से डाक विभाग ने डिजिटल डिवाइड को भी कम करने की मुहिम छेड़ी है। आखिरकार अपने देश में इंटरनेट प्रयोक्ता महज 7 फीसदी हंै। आज डाकिया सिर्फ सिर्फ पत्र नहीं बांटता बलिक घरों से पत्र इकट्ठा करने और डाक-स्टेशनरी बिक्री का भी कार्य करता है। समाज के हर सेक्टर की जरूरतों के मुताबिक डाक-विभाग ने डाक-सेवाओं का भी वर्गीकरण किया है, मसलन बल्क मेलर्स के लिए बिजनेस पोस्ट तो कम डाक दरों के लिए बिल मेल सेवा उपलब्ध है। पत्रों के प्रति क्रेज बरकरार रखने के लिए खुश्बूदार डाक-टिकट तक जारी किए गए हैं। आई0टी0 के इस दौर में चुनौतियों का सामना करने के हेतु डाक विभाग अपनी ब्रांडिंग भी कर रहा है। ‘प्रोजेक्ट एरो‘ के तहत डाकघरों का लुक बदलने से लेकर काउंटर सेवाओं, ग्राहकों के प्रति व्यवहार, सेवाओं को समयानुकूल बनाने जैसे तमाम कदम उठाए गए हैं। इस पंचवर्षीय योजना में डाक घर कोर बैंकिंग साल्यूशन के तहत एनीव्हेयर, एनी टाइम, एनीब्रांच बैंकिंग भी लागू करने जा रहा है। सिम कार्ड से लेकर रेलवे के टिकट और सोने के सिक्के तक डाकघरों के काउंटरों पर खनकने लगे हैं और इसी के साथ डाकिया डायरेक्ट पोस्ट के तहत पम्फ्लेट इत्यादि भी घर-घर जाकर बांटने लगा है। पत्रों की मनमोहक दुनिया अभी खत्म नहीं हुई है। तभी तो अन्तरिक्ष-प्रवास के समय सुनीता विलियम्स अपने साथ भगवद्गीता और गणेशजी की प्रतिमा के साथ-साथ पिताजी के हिन्दी में लिखे पत्र ले जाना नहीं भूलती। हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार।
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।

(विश्व डाक दिवस पर लिखा यह लेख आकाशवाणी पोर्टब्लेयर से 10 अक्तूबर को समाचार-वार्ता के तहत प्रात: 7: 20 पर प्रसारित)

Monday, October 4, 2010

डाक टिकटों में भी दिख रहा है राष्ट्रमंडल खेलों का जलवा


19वें राष्ट्रमंडल खेल-2010 को आकर्षक व यादगार बनाने के लिए भारतीय डाक विभाग ने टेनिस, तीरंदाजी, हाकी और एथलेटिक्स पर चार डाक-टिकटों का एक विशेष सेट इसके उद्घाटन दिवस पर 03 अक्टूबर,2010 को जारी किया है। 5 रू0 प्रति डाक टिकट मूल्य वाली ये डाक टिकटें इंडिया सिक्योरिटी प्रेस हैदराबाद में वेट-आफसेट तकनीक द्वारा मुद्रित हैं एवं कुल 4 लाख प्रत्येक डाक टिकट जारी किए गए हैं। इस डाक टिकट के साथ ही प्रथम दिवस आवरण व विवरणिका भी जारी की गई है। विवरणिका में 19वें राष्ट्रमंडल खेल, 2010 के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई है, वहीँ प्रथम दिवस आवरण पर बैक-ग्राउंड में एयरोस्टेट के चित्र के साथ तीन पदक और राष्ट्रमंडल खेलों का लोगो अंकित है.

गौरतलब है कि इससे पूर्व भारतीय डाक द्वारा विभाग द्वारा शेरा, क्वींस बेटन, तालकटोरा स्टेडियम और जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम पर पहले ही डाक टिकट जारी किया जा चुका है । 25 जून 2010 को राष्ट्रमंडल खेलों पर दो डाक टिकट जारी किये गए थे. इसी दिन क्वीन्स बैटन सभी राष्ट्रमंडल देशों में भ्रमण के बाद भारत पहुँची। इन डाक टिकटों पर क्वीन्स बैटन एवं दूसरे डाक टिकट में दिल्ली के इंडिया गेट की पृष्ठभूमि में गौरवान्वित शेरा को बैटन पकड़े हुए चित्रित किया गया है। क्रमशः 20 और 5 रू0 में जारी ये डाक टिकट इंडिया सिक्योरिटी प्रेस नासिक में फोटोग्रेव्यार तकनीक द्वारा मुद्रित हैं एवं कुल 8 लाख डाक टिकट जारी किए गए. इन डाक टिकटों के साथ-साथ मिनिएचर शीट भी जारी की गई, जिसकी कीमत रू0 25/- है। इसके बाद तालकटोरा स्टेडियम और जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम पर 1 अगस्त, 2010 को 5-5 रूपये के डाक टिकट जारी किये गए, जो कि प्रति डाक टिकट 4-4 लाख जारी किये गए हैं और इंडिया सिक्योरिटी प्रेस नासिक में वेट-आफसेट तकनीक द्वारा मुद्रित हैं. इन डाक टिकटों के साथ भी मिनिएचर शीट जारी की गई.

सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है. डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यही कारण है कि इन डाक-टिकटों का लोगों में बखूबी क्रेज है और विदेशी खिलाड़ी इन्हें स्मृति-चिन्ह के रूप में अपने देश ले जाना चाहते हैं । आज इनकी कीमत भले ही पांच या 20 रुपए है लेकिन भविष्य में ये बहुमूल्य हो जाएंगे। डाक टिकट संग्रह का शौक रखने वाले लोग तो इन्हें भारी संख्या में खरीद रहे हैं। आने वाले दिनों में वाकई यह एक अमूल्य और ऐतिहासिक धरोहर होगी !!

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19वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन 3 अक्तूबर से 14 अक्तूबर, 2010 तक दिल्ली में किया जा रहा है । 1951 तथा 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के बाद दिल्ली में आयोजित होने वाला यह विशालतम बहुस्पर्धात्मक खेल आयोजन हो रहा है. यह भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन का पहला अवसर है, जिसमें 85 देश 17 खेल वर्गों में होने वाली 260 स्पर्धाओं में शामिल होंगें. राष्ट्रमंडल खेल, 2010 का आधिकारिक नारा है, “कम आऊट एंड प्ले“ अर्थात् “उठो, खेलो, जीतो“। यह भारत तथा राष्ट्रमंडल समूह के देशों के हर वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति के लिए आमंत्रण है कि इन खेलों की सच्ची भावना के अनुरूप इनमें अपनी पूरी क्षमता के साथ शामिल हों।

राष्ट्रमंडल खेल गाँव में भी पोस्ट आफिस

संचार क्रांति के साथ दौड़ लगाती दुनिया कितनी भी तेज भाग ले, पर डाक-सेवाओं के बिना सब कुछ अधूरा है. तभी तो राष्ट्रमंडल खेल गाँव में भी पोस्ट आफिस अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है. इस डाक घर का पिन कोड 110090 है । यह कार्यालय इंटरनेशनल जोन की कई दुकानों के बीच स्थित है । 16 सितंबर को खुले इस कार्यालय में स्पीड पोस्ट और पंजीयन सहित सभी प्रमुख सुविधाएं मौजूद हैं । यहां विभिन्न आकार के डाक टिकट भी मौजूद हैं। पोस्ट आफिस को लेकर लोग काफी रोमांचित हैं ओर वे कई सारे डाक टिकट खरीद रहे हैं। गौरतलब है कि भारतीय डाक ने राष्ट्रमंडल खेलों को यादगार बनाने के लिए तमाम डाक टिकट जारी किये हैं. इनमें शेरा, क्वींस बेटन, तालकटोरा स्टेडियम और जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम भी शामिल हैं. खिलाड़ियों के बीच ये डाक टिकट काफी प्रसिद्ध हो रहे हैं और वे इन्हें स्मृति-चिन्ह के रूप में अपने देश ले जाना चाहते हैं । इंग्लैंड टीम की अधिकारी मैगी लिनेस का उत्साह तो देखने लायक है- ‘‘खेल गांव में पोस्ट आफिस होना बहुत फायदेमंद है । हर कोई यहां से अपने घर कुछ न कुछ भेजना चाहता है ।’’ मैगी ने कहा कि वह अपने घर रंगीन पोस्टकार्ड और पत्र भेज रही हैं ।....तो आप भी इस डाक-घर से अपने लोगों को खूबसूरत पत्र भेजिए, जिन पर राष्ट्रमंडल से जुड़े डाक-टिकट लगे हों, वाकई यह एक अमूल्य और ऐतिहासिक धरोहर होगी !!

Saturday, October 2, 2010

डाक-टिकटों पर भी छाये गाँधी जी

विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह एवं शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -‘‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गाँधी जयन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा की तो अमेरिकी कांग्रेस में बापू को दुनिया भर में स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बताते हुए प्रतिनिधि सभा में उनकी 140वीं जयंती मनाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया गया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के मुखिया ओबामा तो गाँधी जी के कायल हैं। उनकी माने तो अगर भारत में अहिंसात्मक आंदोलन नहीं होता तो अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए वैसा ही अहिंसात्मक आंदोलन देखने को नहीं मिलता। निश्चिततः दुनिया का यह दृष्टिकोण आज के दौर में शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है।

महात्मा गाँधी दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेताओं/व्यक्तित्व में से हैं. . यही कारण है कि प्राय: अधिकतर देशों ने उनके सम्मान में डाक-टिकट जारी किये हैं. सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है. डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यह किसी भी राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतीक है। ऐसे में डाक-टिकटों पर स्थान पाना गौरव की बात हैभारत में सर्वाधिक बार डाक-टिकटों पर स्थान पाने वालों में गाँधी जी प्रथम हैं. यहाँ तक कि आजाद भारत में वे प्रथम व्यक्तित्व थे, जिन पर डाक टिकट जारी हुआ. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी गांधीजी की स्मृति में डाक-टिकट जारी किया है.

डाक-टिकटों के परिप्रेक्ष्य में याद आया कि स्वतन्त्रता के बाद सन् 1948 में महात्मा गाँधी पर डेढ़ आना, साढे़ तीन आना, बारह आना और दस रू0 के मूल्यों में जारी डाक टिकटों पर तत्कालीन गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गवर्नमेण्ट हाउस में सरकारी काम में प्रयुक्त करने हेतु ‘‘सर्विस’’ शब्द छपवा दिया। इन आलोचनाओं के बाद कि किसी की स्मृति में जारी डाक टिकटों के ऊपर ‘‘सर्विस’’ नहीं छापा जाता, उन टिकटों को तुरन्त नष्ट कर दिया गया। पर इन दो-तीन दिनों में जारी सर्विस छपे चार डाक टिकटों के सेट का मूल्य दुर्लभता के चलते आज तीन लाख रूपये से अधिक है। वाकई आज गाँधी जी के साथ-साथ उनसे जुडी हर चीजें मूल्यवान हैं, यही कारण है दुनिया भर में उनके प्रशंसक उनसे जुडी चीजों को नीलामी तक में खरीदने के लिए उत्सुक रहते हैं. गाँधी-जयंती पर राष्ट्रपिता का पुनीत स्मरण !!

Thursday, September 30, 2010

मदर टेरेसा की पुण्य-तिथि पर अमेरिका द्वारा डाक टिकट


ममता की प्रतीक मदर टेरेसा के मानवीय सेवा के क्षेत्र में करीब पचास वर्षों के योगदान के लिए उनके सम्मान के तौर पर अमेरिका ने उनकी पुण्यतिथि पर 5 सितम्बर, 2010 को 44 सेंट का एक डाक टिकट जारी किया है। मदर-टेरेसा पर इससे पूर्व भारत सहित तमाम देशों ने डाक -टिकट जारी किये हैं. वाशिंगटन के बेसिलिका में स्थित नेशनल श्राइन आफ द इमेकुलेट कांसेप्शन में एक विशेष समारोह में अमेरिका के डाक विभाग ने यह डाक टिकट जारी किया। इस डाक टिकट में 1979 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मदर टेरेसा की तस्वीर है और इस चित्र को कोलेरैडो स्प्रिंग निवासी प्रख्यात चित्रकार थामस ब्लैकशियर द्वितीय ने तैयार किया है। गौरतलब है कि पाँच सितंबर 1997 को मदर टेरेसा का कोलकाता में निधन हो गया था। मदर को वर्ष 1996 में अमेरिका की मानद् नागरिकता दी गई थी। डाक टिकट अनावरण कार्यक्रम में ब्लैशियर द्वितीय भी उपस्थित थे।

रोमन कैथोलिक नन मदर ने लगभग 50 वर्ष तक भारत और दुनिया के दूसरे देशों में गरीबों और दुखियारों की सेवा की। अल्बानिया की निवासी मदर टेरेसा ने 1950 में कोलकाता में मिशनरीज़ आफ चैरिटी की स्थापना की। भारत में लंबे समय तक काम करने के बाद वह यहीं की नागरिक हो गई थीं। मदर को जब 1979 में नोबेल पुरस्कार मिला, तो उन्होंने उसे ‘गरीबों, भूखों, बीमारों और अकेलेपन के शिकार’ लोगों के नाम कर दिया। उन्होंने पुरस्कार की राशि को ऐसे ही लोगों के नाम दान कर दिया।

पोस्टमास्टर जनरल जान पाटर ने डाक टिकट जारी करने के बाद कहा “आम तौर पर डाक टिकटों को देश के ‘काॅलिंग कार्ड’ कहा जाता है क्योंकि वे स्थानीय और दूसरे देशों के लोगों तक भी पहुंचते हैं। डाक टिकट जारी होने के समारोह के दौरान यूएस पोस्टल सर्विस के बोर्ड आफ गवर्नर्स के सदस्य जेम्स एच बाइबरी, आर्कबिशप पीटरो सांबी समेत चर्च के कई पदाधिकारी मौजूद थे।

Tuesday, September 14, 2010

अंडमान में भी मनाया गया हिंदी-दिवस

भारत के सुदूर दक्षिणी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक डाक सेवा कार्यालय में हिन्दी-दिवस का आयोजन किया गया. निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और पारंपरिक द्वीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया. कार्यक्रम के आरंभ में अपने स्वागत भाषण में सहायक डाक अधीक्षक श्री रंजीत आदक ने इस बात पर प्रसन्नता जाहिर कि निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव स्वयं हिन्दी के सम्मानित लेखक और साहित्यकार हैं, ऐसे में द्वीप-समूह में राजभाषा हिन्दी के प्रति लोगों को प्रवृत्त करने में उनका पूरा मार्गदर्शन मिल रहा है. हिन्दी कि कार्य-योजना पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था, तब से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है. इस अवसर पर जोर दिया गया कि राजभाषा हिंदी अपनी मातृभाषा है, इसलिए इसका सम्मान करना चाहिए और बहुतायत में प्रयोग करना चाहिए.

इस अवसर पर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चर्चित साहित्यकार और निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने हिन्दी को जन-जन की भाषा बनाने पर जोर दिया। अंडमान-निकोबार में हिन्दी के बढ़ते क़दमों को भी उन्होंने रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि हमें हिन्दी से जुड़े आयोजनों को उनकी मूल भावना के साथ स्वीकार करना चाहिए। स्वयं डाक-विभाग में साहित्य सृजन की एक दीर्घ परम्परा रही है और यही कारण है कि तमाम मशहूर साहित्यकार इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहें हैं. इनमें प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, सुविख्यात उर्दू समीक्षक शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर जैसे तमाम मूर्धन्य नाम शामिल रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल भी डाक विभाग में ही क्लर्क रहे।

निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव यादव ने अपने उद्बोधन में बदलते परिवेश में हिन्दी की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि- ''आज की हिन्दी ने बदलती परिस्थितियों में अपने को काफी परिवर्तित किया है. विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर तमाम विषयों पर हिन्दी की किताबें अब उपलब्ध हैं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रचलन बढ़ा है, इण्टरनेट पर हिन्दी की बेबसाइटों और ब्लॉग में बढ़ोत्तरी हो रही है, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई कम्पनियों ने हिन्दी भाषा में परियोजनाएं आरम्भ की हैं. निश्चिततः इससे हिन्दी भाषा को एक नवीन प्रतिष्ठा मिली है।'' श्री यादव ने जोर देकर कहा कि साहित्य का सम्बन्ध सदैव संस्कृति से रहा है और हिन्दी भारतीय संस्कृति की अस्मिता की पहचान है। इस अवसर पर पोर्टब्लेयर प्रधान डाकघर के पोस्टमास्टर एम. गणपति ने कहा कि आज हिन्दी भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में अपनी पताका फहरा रही है और इस क्षेत्र में सभी से रचनात्मक कदमों की आशा की जाती है। इस अवसर पर डाकघर के कर्मचारियों में हिंदी के प्रति सुरुचि जाग्रति करने के लिए निबंध लेखन, पत्र लेखन, हिंदी टंकण, श्रुतलेख, भाषण और परिचर्चा जैसे विभिन्न कार्यक्रम भी आयोजित किये गए. कार्यक्रम में जन सम्पर्क निरीक्षक पी. नीलाचलम, कुच्वा मिंज, शांता देब, निर्मला, एम. सुप्रभा, पी. देवदासु, मिहिर कुमार पाल सहित तमाम डाक अधिकारी/ कर्मचारी उपस्थिति रहे. कार्यक्रम का सञ्चालन हिंदी अनुभाग के कुच्वा मिंज द्वारा किया गया.
(जारी प्रेस-विज्ञप्ति)

Tuesday, August 17, 2010

राखी का त्यौहार आया....

राखी का त्यौहार भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्यौहार है जो प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में मनाया जाता है। इस वर्ष भाई-बहन के प्यार का प्रतीक यह पर्व 24 अगस्त को पड़ रहा है। आज इस आधुनिकता एवम विज्ञान के दौर में संसार मे सब कुछ हाईटेक हो गया है। वहीं हमारे त्यौहार भी हाईटेक हो गए है। इन्टरनेट व एस0एम0एस0 के माध्यम से आप किसी को कहीं भी राखी की बधाई दे सकते है। किन्तु जो प्यार, स्नेह, आत्मीयता एवं अपनेपन का भाव बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधने पर है वो इस हाईटेक राखी में नही है। इस सम्बन्ध में हिन्दी फिल्म का एक मशहूर गाना याद आता है-‘‘बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है, कच्चे धागे से सारा संसार बाँधा है।‘‘ इन पंक्तियों में छुपा भाव इस पर्व की सार्थकता में चार चाँद लगा देता है। डाकिया बाबू इन भावनाओं को हर साल आपके दरवाजे तक पहुँचाता है, सो इस साल भी तैयार है।

बहनों द्वारा राखियों को सुरक्षित एवं सुगमता से भेजने के लिए डाक विभाग ने विभिन्न रंग-रूपों में विशेष तरह के लिफाफे जारी किये गये हैं। ये लिफाफे पूर्णतया वाटर प्रूफ, मजबूत, पारगमन के दौरान न फटने, रंगबिरंगे एवं राखी की विभिन्न डिजाइनों से भरपूर है। इसके चलते जहाँ राखी प्राप्त करने वाले को प्रसन्नता होगी, वहीं इनकी छंटाई में भी आसानी होगी। यही नहीं राखी डाक को सामान्य डाक से अलग रखा जा रहा है। लोगों की सुविधा के लिए डाकघरों में अलग से डलिया लगाई गयी हैं, जिन पर स्थान का नाम लिखा है। पोस्ट की गई राखियों को उसी दिन विशेष बैग द्वारा सीधे गंतव्य स्थानों को प्रेषित कर दिया जा रहा है, ताकि उनके वितरण में किसी भी प्रकार की देरी न हो। ऐसे सभी भाई जो अपने घर से दूर है तथा देश की सीमा के सजग प्रहरी हमारे जवान जो बहुत ही दुर्गम परिस्थियो मे भी देश की सुरक्षा मे लगे है उन सभी की कलाई पर बँधने वाली राखी को सुरक्षित भेजे जाने के लिए भी डाक विभाग ने विशेष प्रबन्ध किये हैं। तो आप भी रक्षाबन्धन का इन्तजार कीजिए और इन्तजार कीजिए डाकिया बाबू जो आपकी राखी को आप तक पहुँचाना सुनिश्चित करेंगे और भाई-बहन के इस प्यार भरे दिवस के गवाह बनेंगे।

Thursday, August 12, 2010

अब एड्रेस प्रूफ कार्ड भी बनाएगा डाक-विभाग

डाक विभाग अभी तक लोगों के पते पर चिट्ठियाँ ही पहुँचाता रहा है, पर अब लोगों के लिए एड्रेस प्रूफ कार्ड भी बनाएगा। इस कार्ड का विभिन्न कार्यों हेतु इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह कार्ड कोई भी वैध भारतीय नागरिक जिसकी उम्र 18 वर्ष से ऊपर है, बनवा सकता है। इसके लिए सम्बंधित वितरण डाकघर से 10 रूपये का एक फार्म लेकर भरना होगा, जिसमें व्यक्ति का पूरा नाम, माता-पिता/पति-पत्नी इत्यादि का नाम, जन्म तिथि, वर्तमान पता व इस पते पर रहने की अवधि, स्थाई पता, किरायेदार की स्थिति में मकान मालिक के बारे में जानकारी, रोजगारपरक होने पर उसकी जानकारी व परिचय पत्र की फोटो काॅपी, रोजगार प्रदाता का पता व ईमेल आई0 डी0, व्यक्ति का टेलीफोन नम्बर, बल्ड ग्रुप, पहचान का चिन्ह इत्यादि जानकारियाँ एकत्र की जाएंगी। यह फार्म संबंधित वितरण डाकघर से ही खरीदा व जमा किया जाएगा। फार्म के साथ दो फोटो भी जमा करवाने होंगे। इन सब अपचैरिकताओं के बाद जनसंपर्क निरीक्षक (डाक) द्वारा फार्म में भरी गई सूचनाओं को सत्यापित किया जाएगा ओर तत्पश्चात सभी जानकारियां सही पाए जाने पर एड्रेस प्रूफ कार्ड जारी किया जाएगा।
इस सारी प्रक्रिया के लिए 240 रूपये का शुल्क डाकघर में जमा करवाना होगा। डाक विभाग के लिए यह कार्ड मेंसर्स यू0 टी0 आई0 टेक्नालाॅजी सर्विज लिमेटड द्वारा तैयार किया जाएगा जो कि अल्ट्रा टच फिनिश पर आधारित होगा। यह कार्ड तीन वर्ष के लिए वैध होगा और पुनः नवीनीकरण 140 रूपये जमाकर कराया जा सकता है। डुप्लीकेट कार्ड हेतु 90 रूपये डाकघर में जमा करने होंगे। एड्रेस प्रूफ कार्ड पर एक यूनिक नम्बर दर्ज होगा जिसमें संबंधित प्रधान डाकघर का संक्षिप्त नाम और चार अंकों का क्रमांक एवं जारी होने का वर्ष दर्ज होगा। गौरतलब है कि यह योजना पहली बार तमिलनाडु सर्किल द्वारा आरम्भ की गई थी। वहाँ पर इसे काफी अच्छा रिस्पांस मिला। इसके बाद इसे अखिल भारतीय स्तर पर लागू किया जा रहा है।

Saturday, August 7, 2010

जहाँ ईश्वर को लिखी जाती है पाती

आपने वो वाली कहानी तो सुनी ही होगी, जिसमें एक किसान पैसों के लिए भगवान को पत्र लिखता है और उसका विश्वास कायम रखने के लिए पोस्टमास्टर अपने स्टाफ से पैसे एकत्र कर उसे मनीआर्डर करता है। दुर्भाग्यवश, पूरे पैसे एकत्र नहीं हो पाते और अंतत: किसान डाकिये पर ही शक करता है कि उसने ही पैसे निकाल लिए होंगे, क्योंकि भगवान जी कम पैसे कैसे भेज सकते हैं.

सवाल आस्था से जुड़ा हुआ है. कहते हैं आस्था में बड़ी ताकत होती है. अपनी आस्था प्रदर्शित करने के हर किसी के अपने तरीके हैं. कुछ लोग शांति के साथ पूजा करते हैं, तो कुछ मंत्रोच्चार के साथ अथवा भजन गाकर। लेकिन उड़ीसा के खुर्दा जिले में एक मंदिर ऐसा भी है, जहाँ लोग ईश्वर को पत्र लिखकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए आराधना करते हैं। भुवनेश्वर से 50 किलोमीटर दूर यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का भी प्रतीक है। गुंबद पर जहाँ अर्द्धचंद्राकार कृति है, वहीं चक्र भी बना हुआ है।

इस मंदिर में पत्र लिखने की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसकी जानकारी तो किसी को नहीं है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि पत्र लिखकर आप कोई इच्छा व्यक्त करते हैं, तो आपकी मनोकामना पूरी होगी। आपकी जो भी मनोकामना हो उसे लिख डालें और फिर उसे मंदिर की दीवार पर लगा दें। 17 वीं शताब्दी के इस बोखारी बाबा के मंदिर में प्रतिदिन हजारों लोग पहुंचते हैं। इसे सत्य पीर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोग पहुंचते हैं।

इस मंदिर की खासियत यह है कि यहाँ का पुजारी मुसलमान है, लेकिन दूध, और केले से बने भोग को हिन्दू तैयार करते हैं। यहाँ के धांदू महापात्र बड़े गर्व से बताए हैं कि हमारा परिवार पीढ़ियों से मंदिर में फूल पहुंचाता रहा है और अब मैं भी उसी परंपरा का निर्वाह कर रहा हूँ. यह स्थल सांप्रदायिक सद्भाव की जीती-जागती मिसाल है। यहाँ मुस्लिम श्रद्धालु चादर चढ़ाते हैं तो हिन्दू श्रद्धालु पुष्प अर्पित करते हैं। मंदिर के पुजारी सतार खान बताते हैं कि इस मंदिर में विभिन्न धर्मों के लोग आतें हैं।वे यहाँ कागज के टुकड़े पर अपनी मनोकामना लिखते हैं और फिर उसे दीवार पर लगा देते हैं। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो दोबारा आते हैं और बोखारी बाबा को चादर अथवा फूल चढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु यहाँ आने में असमर्थ होते हैं, वे यहाँ पत्र भेज देते हैं और हम उसे दीवार पर लगा देते हैं। वाकई हम 21 वीं सदी में विज्ञानं के बीच भले ही जी रहे हों, पर ईश्वरीय आस्था जस की तस कायम है. यही हमारी परम्परा है, आस्था है, संस्कृति है...!!

Wednesday, August 4, 2010

कामनवेल्थ खेलों पर जारी डाक-टिकटों का क्रेज

भारत इस वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन कर रहा है और काॅमनवेल्थ खेल-2010 को आकर्षक व यादगार बनाने के लिए भारतीय डाक विभाग ने भी दो स्मारक डाक टिकट जारी किए हैं। गौरतलब है कि क्वीन्स बैटन के साथ रत्नजड़ित बक्से में ब्रिटेन के महारानी के संदेश को रखा गया है और इस संदेश को प्राचीन भारतीय पत्रों के प्रतीक 18 कैरट सोने की पत्ती में लेजर से मीनिएचर के रूप में उकेरा गया है ताकि इसे आसानी से प्रयोग किया जा सके। इन डाक टिकटों पर क्वीन्स बैटन एवं दूसरे डाक टिकट में दिल्ली के इंडिया गेट की पृष्ठभूमि में गौरवान्वित शेरा को बैटन पकड़े हुए चित्रित किया गया है। क्रमशः 20 और 5 रू0 में जारी ये डाक टिकट इंडिया सिक्योरिटी प्रेस नासिक में फोटोग्रेव्याॅर तकनीक द्वारा मुद्रित है एवं कुल 8 लाख डाक टिकट जारी किए गए हैं। इन डाक टिकटों के साथ-साथ मिनिएचर शीट भी जारी की गई है, जिसकी कीमत रू0 25/- है। यह डाक टिकट 25 जून 2010 को जारी किए गए, जिस दिन क्वीन्स बैटन सभी राष्ट्रमंडल देशों में भ्रमण के बाद भारत पहुँची। फ़िलहाल लोगों में इन डाक टिकटों का खूब क्रेज देखा जा रहा है !!

Saturday, July 31, 2010

डाककर्मी के पुत्र थे प्रेमचंद

1920 का दौर... गाँधी जी के रूप में इस देश ने एक ऐसा नेतृत्व पा लिया था, जो सत्य के आग्रह पर जोर देकर स्वतन्त्रता हासिल करना चाहता था। ऐसे ही समय में गोरखपुर में एक अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर जब जीप से गुजर रहा था तो अकस्मात एक घर के सामने आराम कुर्सी पर लेटे, अखबार पढ़ रहे एक अध्यापक को देखकर जीप रूकवा ली और बडे़ रौब से अपने अर्दली से उस अध्यापक को बुलाने को कहा । पास आने पर उसी रौब से उसने पूछा-‘‘तुम बडे़ मगरूर हो। तुम्हारा अफसर तुम्हारे दरवाजे के सामने से निकल जाता है और तुम उसे सलाम भी नहीं करते।’’ उस अध्यापक ने जवाब दिया-‘‘मैं जब स्कूल में रहता हूँ तब मैं नौकर हूँ, बाद में अपने घर का बादशाह हूँ।’’



अपने घर का बादशाह यह शख्सियत कोई और नहीं, वरन् उपन्यास सम्राट प्रेमचंद थे, जो उस समय गोरखपुर में गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही में जन्मे प्रेमचन्द का असली नाम धनपत राय था। आपकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम अजायब राय था। प्रेमचंद जी के पिता अजायब राय डाक-कर्मचारी थे सो प्रेमचंद जी अपने ही परिवार के हुए।आज उनकी जयंती पर शत-शत नमन। डाक-परिवार अपने ऐसे सपूतों पर गर्व करता है व उनका पुनीत स्मरण करता है।


(प्रेमचंद जी पर मेरा विस्तृत आलेख साहित्याशिल्पी पर पढ़ सकते हैं)







Tuesday, July 27, 2010

सावन में घर बैठे डाक द्वारा काशी विश्वनाथ व महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का प्रसाद

सावन का मौसम आज से आरंभ हो गया। इस मौसम में पूरे मास भगवान शिव की पूजा होती है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है और काशी विश्वनाथ मंदिर यहाँ का प्रमुख धार्मिक स्थल है। डाक विभाग और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के बीच वर्ष 2006 में हुए एक एग्रीमेण्ट के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर का प्रसाद डाक द्वारा भी लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके तहत साठ रूपये का मनीआर्डर प्रवर डाक अधीक्षक, बनारस (पूर्वी) के नाम भेजना होता है और बदले में वहाँ से काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के सौजन्य से मंदिर की भभूति, रूद्राक्ष, भगवान शिव की लेमिनेटेड फोटो और शिव चालीसा प्रेषक के पास प्रसाद रूप में भेज दिया जाता है।



काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का प्रसाद भी डाक द्वारा मंगाया जा सकता है। इसके लिए प्रशासक, श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबन्धन कमेटी, उज्जैन को 151 रूपये का मनीआर्डर करना पड़ेगा और इसके बदले में वहाँ से स्पीड पोस्ट द्वारा प्रसाद भेज दिया जाता है। इस प्रसाद में 200 ग्राम ड्राई फ्रूट, 200 ग्राम लड्डू, भभूति और भगवान श्री महाकालेश्वर जी का चित्र शामिल है।




इस प्रसाद को प्रेषक के पास एक वाटर प्रूफ लिफाफे में स्पीड पोस्ट द्वारा भेजा जाता है, ताकि पारगमन में यह सुरक्षित और शुद्ध बना रहे। तो अब आप भी सावन की इस बेला पर घर बैठे भोले जी का प्रसाद ग्रहण कीजिये और मन ही मन में उनका पुनीत स्मरण कर आशीर्वाद लीजिए !!




वन्दे देव उमा पतिम् सुरगुरुम् ।



वन्दे जगत कारणम् ।



वन्दे पन्नग भूषणम्मृगधरम् ।



वन्दे पशुनाम पतिम ।



वन्दे सूर्य शशांक वन्हिनयनम् ।



वन्दे मुकन्द प्रियम् ।



वन्दे भक्तजनाश्रयन्चवर्धम् ।



वन्दे शिवम् शंकरम् ।। ।। जय शंकर ।।।।



जय भोले नाथ ।।



भगवान शिव का नमन करते हुए आपको श्रावण मास के इस पावन पर्व पर हार्दिक बधाई।

Friday, July 16, 2010

चिट्ठी न कोई संदेश.....


पूरी छुट्टियां निकल गईं, और उस अलमारी की सफाई नहीं कर पाई, जो साल भर से मेरा मुंह जोह रही थी, आज बिना किसी प्लान के उसे साफ़ करने बैठ गई. एक बड़ा सा लिफाफा दिखाई दिया, पिछले कई सालों से इस लिफ़ाफ़े को बिना देखे ही पोंछ-पांछ के रख देती थी, आज खोल लिया, तमाम अंतर्देशीय, पोस्ट कार्ड, और लिफ़ाफ़े सामने बिखर गए और इन सारी चिट्ठियों के पीछे हमारे पोस्टमैन चाचा का चेहरा उभर कर दिखाई देने लगा.लगा कितने दिन हो गए किसी की चिट्ठी आये हुए.कितनी बार रोका है खुद को पुराने किस्से लिखने से, लेकिन क्या करुँ, पिछले बीस सालों में समय कुछ ऐसे बदला हैं, कुछ आदतें इस क़दर ख़त्म हुईं हैं, कि लिखने कुछ और बैठती हूँ, लिख कुछ और ही जाता है.आज भी नए टीवी शो " बिग-मनी" पर लिखने का मन बनाया था, लेकिन बीच में ये चिट्ठियाँ आ गईं.मन फिर वही नौगाँव की गलियों में भटकने लगा.

वो समय पोस्ट-ऑफिस के स्वर्ण युग की तरह था. चिट्ठी, तार, टेलीफोन, पार्सल, रजिस्ट्री, मनी ऑर्डर..सारे काम पोस्ट ऑफिस से, पोस्ट मैन कितने महत्वपूर्ण होते थे त. घरों में फोन लगवाने का चलन नहीं था. टेलीफोन तब केवल ऑफिसों में, बड़े सरकारी अधिकारियों के घरों में होते थे. सार्वजनिक रूप से टेलीफोन की सुविधा केवल पोस्ट ऑफिस में ही मिलती थी. लोग भी जब बहुत ज़रूरी हो, तभी फोन लगाने जाते थे. बाहर कहीं फोन लगाना है, तो ट्रंक-कॉल बुक होती थी. लाइन मिलने पर खूब चिल्ला-चिल्ला के बात करनी पड़ती थी. शायद इसीलिये पुराने लोग आज भी मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से बात करते मिल जायेंगे...:)

तो पोस्ट ऑफिस का अपना अलग ही रुतबा था. और पोस्ट-मास्टर से ज्यादा पोस्ट मैन का. हम घर में पोस्ट मैन का इंतज़ार इस तरह करते थे, जैसे किसी ख़ास मेहमान का. सुबह ग्यारह बजे और दोपहर में एक बजे डाक आती थी. हम सब भाई-बहन इस कोशिश में रहते कि पत्र उसी के हाथ में आये, भले ही वो हमारे काम का हो या न हो. हमारे कान बाहर ही लगे रहते. उधर पोस्ट मैन की आवाज़ आई, इधर हम गिरते-पड़ते भागते... चिट्ठी पा जाने वाला विजेता की मुद्रा में मुस्कुराता, पत्र खोलता, हमारी आँखें उस पर लगी रहतीं- " किसका है?" जिसे पत्र मिलता, उसे ही पत्र पढ़ के सुनने का हक़ होता. घर के सारे पढ़े-लिखे लोग, पत्र सुनने बैठ जाते।

सुनने के बाद, यदि किसी ख़ास का पत्र है, तो बारी-बारी से सब पढ़ते. राय-मशविरा होता. और फिर उसे हमारे पापा अपनी फ़ाइल में सहेज लेते. पत्रों के जवाब देना उनकी दिनचर्या में शामिल था.
हमारे पोस्ट मैन, जिन्हें हम चाचा कहते थे, बड़ी दूर से "अवस्थी जीईईईई ...." की हांक लगाते थे, जिस पर हम दौड़े चले आते थे।

कुछ और बाद में जब मैं छपने लगी तो मेरी फैन-मेल आने लगी, अब पोस्ट मैन चाचा मेरे लिए और भी ख़ास हो गए थे. रचनाएं वापस न आ रहीं हों, इस डर से मेरी कोशिश होती थी कि पोस्ट मैन के आने के वक्त मैं ही बाहर रहूँ :)
धीरे-धीरे टेलीफोन का चलन बढ़ा, तो चिट्ठियों में कुछ कमी आई. लेकिन अब, जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है, नेट का चलन आम हो गया है, पत्र आने ही बंद हो गए. कभी कोई सरकारी डाक आ जाती है बस. लोग पत्र लिखना ही भूल गए. अब तो ये भी नहीं मालूम कि लिफाफे या पोस्ट कार्ड की कीमत आज कितनी है?
इन त्वरित सेवाओं ने निश्चित रूप से दूरियां काम की हैं, लेकिन इनसे उस काल-विशेष को सहेजा नहीं जा सकता. यादों में शामिल नहीं किया जा सकता, किसी बात का अब साक्ष्य ही नहीं.. सब मौखिक रह गया...लिखित कुछ भी नहीं..
कभी-कभी सुविधाएं भी कितनी अखरने लगतीं हैं.. !!

(साभार : वन्दना अवस्थी दुबे के 'अपनी बात' ब्लॉग से )

Friday, June 11, 2010

डाक विभाग से जुडी रही हैं तमाम मशहूर हस्तियाँ

डाक विभाग ने तमाम प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे।

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। उर्दू अदब की बेमिसाल शख्सियत पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी,केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार डा. कमल किशोर गोयनका, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी,जोशी, सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ कमल किशोर गोयनकाजोशी जजोशीजोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक-तार विभाग से जुड़ी रहीं। स्वयं उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के पिता डाक-तार विभाग में ही थे। 


साहित्य जगत में अपनी पहचान स्थापित करने वाले तमाम नाम- कवि तेजराम शर्मा, कर्नल तिलक राज, सुजाता चौधरी ,  कहानीकार दीपक कुमार बुदकी, कथाकार ए. एन. नन्द, ब्लॉगर और साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव, शायर अब्दाली, गीतकार राम प्रकाश शतदल, गणेश गम्भीर, गजलकार केशव शरण, कहानीकार गोवर्धन यादव, बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबंधु, लघु कथाकार बलराम अग्रवाल, कालीचरण प्रेमी, अनुराग लाक्षाकर, मंचीय कवि जवाहर लाल जलज, शारदानंद दुबे, जितेन्द्र कुमार, शायर आलम, हास्यकवि जैमिनी हरियाणवी , बंधु कुशावर्ती (लखनऊ), वंदना सक्सेना (इटावा),  खुर्शीद, हास्यकवि जैमिनी हरियाणवी, बंधु कुशावर्ती(लखनऊ), वंदना सक्सेना(इटावा), इत्यादि भारतीय डाक विभाग की समृद्ध परंपरा के ही अंग हैं। बी एम नेगी (देहरादून), लगभग हर पत्रिका जिनके रेखाचित्रों से युक्त रहती है, भी इसी परिवार के अंग रहे हैं । 

यह तो सिर्फ उन लोगों की सूची है, जिनके नाम जाहिर हैं । इससे परे भी तमाम लोग साहित्य-कला-संस्कृति में अपना जौहर दिखा रहे हैं। स्पष्ट है कि डाक विभाग सदैव से एक समृद्ध विभाग रहा है और तमाम मशहूर शख्सियतें इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहीं। 

Wednesday, May 26, 2010

विश्व का सबसे महंगा डाक टिकट : 'ट्रेस्किलिंग येलो'

कभी आपने सोचा है कि एक डाक-टिकट की कीमत क्या हो सकती है. दहाई, सैकड़ा या हजार..जी नहीं. 22 मई, 2010 को स्विट्ज़रलैंड की राजधानी जेनेवा में विश्व के सबसे महंगे डाक टिकट 'ट्रेस्किलिंग येलो' की नीलामी हुई। यह डाक टिकट वर्ष 1855 में स्वीडन में छपा था।

इसके बारे में बताया जाता है कि दुनिया के सर्वाधिक दुर्लभ डाक टिकटों में से एक ट्रेस्किलिंग येलो [पीली टिकट] की जब छपाई हो रही थी, तो गलती से यह तीन शिलिंग की श्रेणी में छप गया। जबकि तीन शिलिंग के टिकट का रंग हरा होता था और पीले टिकट की कीमत आठ शिलिंग होती थी। इसीलिए इसे ट्रेस्किलिंग येलो कहा गया. ऐसे में यह दुर्लभ डाक टिकटों कि श्रेणी में आ गया और फिलेतलिस्ट इसके लिए मुँहमाँगी मुरीद देने को तैयार हो गए.

वर्ष 1885 में यह डाक- टिकट एक स्कूली लड़के के पास था। जिसने जेब खर्च के लिए अपने डाक टिकट संग्रह को बेच दिया था। तब से यह जर्मनी और ब्राजील के धन्ना सेठों सहित टिकट संग्रह करने वाले बहुत से लोगों के हाथों से गुजरा। अंतिम बार यह वर्ष 1996 में एक नीलामी में 2.3 मिलियन यू. एस. डालर (करीब 14 करोड़ रुपये) में बिका था। 16 वर्षों बाद 23 मई, 2010 को स्विट्ज़रलैंड की राजधानी जेनेवा में जब विश्व के इस सबसे महंगे डाक टिकट की नीलामी हुई तो यह डाक टिकट बेचने वाले डेविड फेल्डमैन ने न तो खरीददार का नाम बताया है और न कीमत। कारण, यह डाक टिकट इतना दुर्लभ और महँगा है कि इसके लिए खरीददार की जान के पीछे भी लोग पड़ सकते हैं. आखिरकार, 16 साल पहले जिस डाक टिकट की नीलामी 2.3 मिलियन यू. एस. डालर में हुई थी, उसके आज के नीलामी मूल्य के बारे में मात्र सोचा ही जा सकता है.

Monday, May 24, 2010

वो चिट्ठियों की दुनिया

अभी हाल ही में मेरे एक मित्र की सगाई सम्पन्न हुई। पेशे से इंजीनियर और हाईटेक सुविधाओं से लैस मेरा मित्र अक्सर सेलफोन या चैटिंग के द्वारा अपनी मंगेतर से बातें करता रहता। तभी एक दिन उसे अपनी मंगेतर का पत्र मिला। उसे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि पत्र में तमाम ऐसी भावनायें व्यक्त की गई थीं, जो उसे फोन पर या चैटिंग के दौरान भी नहीं पता चली थीं। अब मेरे मित्र भी अपनी खूबसूरत मनोभावनाओं को मंगेतर को पत्र लिखकर प्रकट करने लगे हैं। इसी प्रकार बिहार के एक गाँव से आकर दिल्ली में बसे अधिकारी को अपनी माँ की बीमारी का पता तब चला जब वे एक साल बाद गाँव लौटकर गये। उन्हें जानकर आश्चर्य हुआ कि इतनी लंबी बीमारी उनसे कैसे छुपी रही, जबकि वे हर सप्ताह अपने घर का हाल-चाल फोन द्वारा लेते रहते थे। आखिरकार उन्हें महसूस हुआ कि यदि इस दौरान उन्होंने घर से पत्र-व्यवहार किया होता तो बीमारी की बात जरूर किसी न किसी रूप में पत्र में व्यक्त होती।

वस्तुतः संचार क्रान्ति के साथ ही संवाद की दुनिया में भी नई तकनीकों का पदार्पण हुआ। टेलीफोन, मोबाइल फोन, इण्टरनेट,फैक्स,वीडियो कान्फं्रेसिंग जैसे साधनों ने समग्र विश्व को एक लघु गाँव में परिवर्तित कर दिया। देखते ही देखते फोन नम्बर डायल किया और सामने से इच्छित व्यक्ति की आवाज आने लगी। ई-मेल या एस0एम0एस0 के द्वारा चंद सेकेंडों में अपनी बात दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचा दी। वैश्विक स्तर पर पहली बार 1996 में संयुक्त राज्य अमेरिका में ई-मेल की कुल संख्या डाक सेवाओं द्वारा वितरित पत्रों की संख्या को पार कर गई और तभी से यह गिरावट निरन्तर जारी है। ऐसे में पत्रों की प्रासंागिकता पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे। क्या वाकई पत्र-लेखन अतीत की वस्तु बनकर रह गया है? क्या सुदूर देश में बैठे अपने पति के पत्रों के इन्तजार में पत्नियाँ बार-बार झांककर यह नहीं देखतीं कि कहीं डाकिया बाबू उनका पत्र बाहर ही तो नहीं छोड़ गया? क्या पत्र अब किताबों में और फिर दस्तावेजों में नहीं बदलेगें ?....... पत्रों से दूरी के साथ ही अहसास की संजीदगी और संवेदनाएं भी खत्म होने लगीं।

सभ्यता के आरम्भ से ही मानव किसी न किसी रूप में पत्र लिखता रहा है। दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व का माना जाता है, जो कि मिट्टी की पटरी पर लिखा गया था। यह बेबीलोन के खंडहरों से मिला था, जो कि मूलतरू एक प्रेम-पत्र था। बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ष्मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।ष् यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और आज हम वर्ष 2010 में जी रहे हैं।

जब संचार के अन्य साधन न थे, तो पत्र ही संवाद का एकमात्र माध्यम था। पत्रों का काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अजीब रहस्य या गोपनीयता, संग्रहणीयता, लेखन कला एवं अतीत को जानने का भाव भी छुपा होता है। पत्रों की सबसे बडी विशेषता इनका आत्मीय पक्ष है। यदि पत्र किसी खास का हुआ तो उसे छुप-छुप कर पढ़ने में एवम् संजोकर रखने तथा मौका पाते ही पुराने पत्रों के माध्यम से अतीत में लौटकर विचरण करने का आनंद ही कुछ और है। यह सही है कि संचार क्रान्ति में चिठ्ठियों की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया है और पूरी दुनिया का बहुत करीब ला दिया है। पर इसका एक पक्ष यह भी है कि इसने दिलों की दूरियाँ इतनी बढ़ा दी हैं कि बिल्कुल पास में रहने वाले अपने इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों की भी लोग खोज-खबर नहीं रखते। ऐसे में संवेदनाओं को बचा पाना कठिन हो गया है। युवा कवयित्री आकांक्षा यादव की कविता ’एस0एम0एस0’ में इसकी एक बानगी देखी जा सकती है- अब नहीं लिखते वो खत/करने लगे हैं एस0 एम0 एस0/तोड़ मरोड़ कर लिखे शब्दों के साथ/करते हैं खुशी का इजहार/मिटा देता है हर नया एस0 एम0 एस0/पिछले एस0 एम0 एस0 का वजूद/एस0 एम0 एस0 के साथ ही/शब्द छोटे होते गए/भावनाएँ सिमटती गईं/खो गयी सहेज कर रखने की परम्परा/लघु होता गया सब कुछ/रिश्तों की कद्र का अहसास भी।

पत्र लिखना एक शौक भी है। आज भी स्कूलों में जब बच्चों को पत्र लेखन की विधा सिखायी जाती है तो अनायास ही वे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों या मित्रों को पत्र लिखने का प्रयास करने लगते हैं। फिर शुरू होता है पिता की हिदायतों का दौर और माँ द्वारा जल्द ही बेटे को अपने पास देखने की कामना व्यक्त करना। पत्र सदैव सम्बंधों की उष्मा बनाये रखते हैं। पत्र लिखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें कोई जल्दबाजी या तात्कालिकता नहीं होती, यही कारण है कि हर छोटी से छोटी बात पत्रों में किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त हो जाती है जो कि फोन या ई-मेल द्वारा सम्भव नहीं है। पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता इनका स्थायित्व है। कल्पना कीजिये जब अपनी पुरानी किताबों के बीच से कोई पत्र हम अचानक पाते हैं, तो लगता है जिन्दगी मुड़कर फिर वहीं चली गयी हो। जैसे-जैसे हम पत्रोें को पलटते हैं, सम्बन्धों का एक अनंत संसार खुलता जाता है। किसी शायर ने क्या खूब लिखा है-

खुशबू जैसे लोग मिले अफसाने में
एक पुराना खत खोला अनजाने में

सिर्फ साधारण व्यक्ति ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी पत्रों के अंदाज को जिया है। पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह महात्मा गाँधी हों, नेपोलियन, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। माक्र्स-एंजिल्स के मध्य ऐतिहासिक मित्रता का सूत्रपात पत्रों से ही हुआ। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उस स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखा, जिसमें उनका पुत्र अध्ययनरत था। इस पत्र में उन्होंने प्राचार्य से अनुरोध किया था कि उनके पुत्र को वे सारी शिक्षायें दी जाय, जो कि एक बेहतर नागरिक बनने हेतु जरूरी हैं। इसमें किसी भी रूप में उनका पद आडे़ नहीं आना चाहिये। महात्मा गाँधी तो रोज पत्र लिखा करते थे। महात्मा गाँधी तो पत्र लिखने में इतने सिद्धहस्त थे कि दाहिने हाथ के साथ-साथ वे बाएं हाथ से भी पत्र लिखते थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी को जेल से भी पत्र लिखते रहे। ये पत्र सिर्फ पिता-पुत्री के रिश्तों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें तात्कालिक राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश का भी सुन्दर चित्रण है। इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व को गढ़ने में इन पत्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज ये किताब के रूप में प्रकाशित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुके हैं। इन्दिरा गाँधी ने इस परम्परा को जीवित रखा एवं दून में अध्ययनरत अपने बेटे राजीव गाँधी को घर की छोटी-छोटी चीजों और तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बारे में लिखती रहीं। एक पत्र में तो वे राजीव को रीवा के महाराज से मिले सौगातों के बारे में भी बताती हैं। तमाम राजनेताओं-साहित्यकारों के पत्र समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। इनसे न सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के संबंध में जाने-अनजाने पहलुओं का पता चलता है बल्कि तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश के संबंध में भी बहुत सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं।


यह अनायास ही नहीं है कि डाक विभाग ने तमाम प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। उर्दू अदब की बेमिसाल शख्सियत पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग से जुड़ी रहीं। स्वयं उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के पिता डाक-तार विभाग में ही थे। साहित्य जगत में अपनी पहचान स्थापित करने वाले तमाम नाम- कवि तेजराम शर्मा, साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव, कहानीकार दीपक कुमार बुदकी, कथाकार ए. एन. नन्द, शायर अब्दाली, गीतकार राम प्रकाश शतदल, गजलकार केशव शरण, कहानीकार व समीक्षक गोवर्धन यादव, बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबंधु, लघु कथाकार बलराम अग्रवाल, कालीचरण प्रेमी, अनुराग लाक्षाकर, मंचीय कवि जवाहर लाल जलज, शारदानंद दुबे, जितेन्द्र कुमार, शायर आलम खुर्शीद इत्यादि भारतीय डाक विभाग की समृद्ध परंपरा के ही अंग हैं। स्पष्ट है कि डाक विभाग सदैव से एक समृद्ध विभाग रहा है और तमाम मशहूर शख्सियतें इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

सूचना क्रान्ति की बात करने वाले दिग्गज भले ही बड़ी-बड़ी बातें करें, पर भारतीय संदर्भ में इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आज भी एक अरब से ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्र में लगभग 50 करोड़ लोगों के पास ही टेलीफोन सुविधायें हैं अर्थात् समग्र टेलीफोन घनत्व मात्र लगभग 45 फीसदी है, जबकि गाँवों में यह और भी कम है। इण्टरनेट सुविधा का इस्तेमाल तो वर्ष 2008 तक मात्र 4.53 करोड़ लोग ही कर रहे थे। सूचना क्रान्ति के दिग्गज तो आज एफ0एम0 क्रान्ति की बात करते हैं, पर गाँवों में जाकर देखिए कितने लोग एफ0एम0 के बारे में जानते हैं। दूरदर्शन को पिछड़ा करार देकर बहु-चैनलीय संस्कृति की बात की जा रही है, टेलीफोन की बजाय मोबाइल और फिर एस0एम0एस0 की जगह एम0एम0एस0 की बात की जा रही है, पर कितने लोग इन सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं। सूचना क्रान्ति के जिन महारथियों ने विभिन्न चैनलों पर पत्रों को घिसा-पिटा करार देकर सीधे एस0एम0एस0 द्वारा जवाब माँगना आरम्भ कर दिया है, वे भारत की कितनी प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं? यह सब ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार चुनावों से पहले बड़े-बड़े ‘‘मतदान पूर्व सर्वेक्षणों’’ का दावा किया जाता है, पर चुनाव के बाद अधिकतर सर्वेक्षण फ्लाप नजर आते हैं। कारण ये सर्वेक्षण समाज के मात्र एक तबके के मध्य ही किये गये हैं, ग्रामीण भारत की उनमें पूरी उपेक्षा की गई है। कोई भी सूचना या संचार क्रान्ति ग्रामीण भारत को शामिल किए बिना संभव नहीं।

पत्र कल भी लिखे जाते रहे हैं और आज भी लिखे जा रहे हैं। आज भी हर मिनट में संसार में 1,90,000 पत्र आते-जाते हैं। हाल ही में अन्तरिक्ष में उड़ान भरने वाली भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स अपने साथ भगवद्गीता और गणेशजी की प्रतिमा के साथ-साथ अपने पिता के हिन्दी में लिखे पत्र भी साथ लेकर गयी हैं। कोई भी अखबार या पत्रिका ‘पाठकों के पत्र’ कालम का मोह नहीं छोड़ पाती है। डाकघरों के साथ-साथ कूरियर सेवाओं का समानान्तर विकास पत्रों की महत्ता को उजागर करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे सूचना क्रान्ति के अगुआ राष्ट्रों में आज भी प्रति व्यक्ति, हर वर्ष 734 डाक मदें प्राप्त करता है अर्थात एक दिन में दो से भी कुछ अंश ज्यादा। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को आज भी रोज 40,000 से ज्यादा पत्र प्राप्त होते हैं। फोन द्वारा न तो हर बात करना सम्भव है और न ही इण्टरनेट हर किसी की हैसियत के अन्तर्गत आते हैं। भारतीय गाँवों में जहाँ पत्नियाँ अभी भी घरों से बाहर ज्यादा नहीं निकलतीं, दूर रह रहे पति को अपनी समस्याओं व भावनाओं से पत्रों के माध्यम से ही अवगत कराती हैं और फिर पति द्वारा भेजी गई चिट्ठियों को सहेज कर बाक्स में सबसे नीचे रखती हैं ताकि अन्य किसी के हाथ न लगें। परदेश कमाने गये बेटे की चिट्ठियाँ अभी भी माँ डाकिये से पढ़वाती है और फिर उसी से जवाब लिखने की भी मनुहार करती हैं। कई बार बातों से जब बात नहीं बनती तो भी लिखने पड़ते हैं पत्र। पत्र हाथ में आते ही चेहरे पर न जाने कितने भाव आते हैं व जाते हैं, कारण पत्र की लिखावट देखकर ही उसका मजमून भांपने की अदा। व्यक्ति चिट्ठियाँ तात्कालिक रूप से भले ही जल्दी-जल्दी पढ़ ले पर फिर शुरू होती है-एकान्त की खोज और फिर पत्र अगर किसी खास के हों तो सम्बन्धों की पवित्र गोपनीयता की रक्षा करते हुए उसे छिप-छिप कर बार-बार पढ़ना व्यक्ति को ऐसे उत्साह व ऊर्जा से भर देता है, जहाँ से उसके कदम जमीं पर नहीं होते। वह जितनी ही बार पत्र पढ़ता है, उतने ही नये अर्थ उसके सामने आते हैं। ऐसा लगता है मानो वे ही साक्षात खड़े हों। ऐसे ही किसी समय में हसरत मोहानी ने लिखा होगा-

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत!

कृष्ण कुमार यादव

Saturday, May 1, 2010

मोर्स कोड टेलीग्राफ


हमारी पिछली पोस्ट 'डाक तार नहीं मात्र डाक विभाग' के सन्दर्भ में कुछेक पाठकों ने टेलीग्राफ के सम्बन्ध में जानकारी चाही थी. उसी क्रम में यह पोस्ट प्रस्तुत है-


महान वैज्ञानिक सैमुअल मोर्स ने मोर्स कोर्ड टेलीग्राफ की खोज करके दुनिया में संचार क्रांति को नया रूप दिया था. मोर्स ने 1840 के दशक में संदेश भेजने की इस नई पद्धति का नाम मोर्स कोड टेलीग्राफ दिया. 19वीं सदी में जब टेलीफोन की खोज नहीं हुई थी उस समय संकेत के द्वारा संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक भेजे जाते थे। सैमुएल मोर्स ने इसका निर्माण वैद्युत टेलीग्राफ के माध्यम से संदेश भेजने के लिए किया था। इस दौर में तार मोर्स कोड के जरिए भेजे जाते थे। मोर्स कोड में वस्तुत : एक लघु संकेत तथा दूसरा दीर्घ संकेत प्रयोग किया जाता है। मोर्स कोड में कुछ भी लिखने के लिए लघु संकेत के रूप में डाट का प्रयोग तथा दीर्घ संकेत के लिए डैश का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा मोर्स कोड के लघु और दीर्घ संकेतों के लिए अन्य चिन्ह भी प्रयुक्त हो सकते हैं जैसे- ध्वनि, पल्स या प्रकाश आदि।

इसका प्रचालन भले ही अब काम हो गया हो पर अभी भी मोर्स कोड पद्धति का इस्तेमाल कई जगह पर गुप्त संदेश भेजने के लिए किया जाता है। पानी के जहाज पर अभी भी इसके जरिए संदेश भेजे जाते हैं। आसानी से पकड़े नहीं जाने के कारण गुप्तचर भी इस पद्धति का प्रयोग करते हैं। सेना के सिग्नल रेजिमेंट में इसका बहुत काम है। मोर्स कोड का इस्तेमाल प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जमकर किया गया। मोर्स कोड के जरिए संदेश को कोड के रूप में बदलकर टेलीग्राफ लाइन और समुद्र के नीचे बिछी केबलों के द्वारा एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था। संदेश पहुंचने के बाद इसे डीकोड करके लोगों तक भेजा जाता था। वस्तुत: मोर्स कोड ने बेतार संचार के क्षेत्र में एक ऐसा रास्ता खोला जो आगे चलकर संचार क्रांति में बदल गया। इससे आगे चलकर टेलीफोन और मोबाइल क्रांति का सूत्रपात हुआ। एक तरह से यह वायरलेस तकनीक की शुरूआत थी और इसी के आधार पर आगे चलकर टेलीफोन, मोबाइल और सेटेलाइट फोन का आगमन हुआ। यह तकनीक पुरानी हो जाने के बावजूद अभी भी काफी प्रासंगिक है और सेना, नौसेना और हैम रेडियो में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कई बार सरकारी कार्यालयों में भी आपात स्थिति हेतु इसका उपयोग किया जाता है !!

Thursday, April 29, 2010

डाक-तार नहीं मात्र डाक विभाग

अक्सर लोगों को कहते सुनता हूँ कि पोस्ट एंड टेलीग्राफ डिपार्टमेंट. पुराने लोगों कि तो छोडिये, नए लोग भी अभी यही जुमला दुहराते हैं. जानकारी के लिए बता दूँ कि अब पोस्ट एंड टेलीग्राफ डिपार्टमेंट पृथक हो चुके हैं. 1984 में डाक व दूरसंचार विभागों के पृथक्करण के साथ ही टेलीग्राफ सेवाएँ दूरसंचार विभाग के साथ जुड़ गईं. अब डाकघरों से टेलीग्राम नहीं होता बल्कि दूरसंचार विभाग के कार्यालयों से होता है. अब पोस्ट एंड टेलीग्राफ डिपार्टमेंट नहीं बल्कि सिर्फ पोस्ट अर्थात डाक विभाग रहा.

वर्तमान में केंद्र सरकार के अधीन संचार मंत्रालय के अधीन डाक, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी- कुल तीन विभाग हैं. इन तीनों विभागों के अपने-अपने सचिव/ CMD होते हैं, जो कि उसी विभाग से होते हैं. मसलन डाक विभाग का सचिव कोई IAS इत्यादि नहीं बल्कि भारतीय डाक सेवा (Indian Postal Services) का वरिष्ठतम अधिकारी ही होता है. डाक भवन संसद मार्ग, नई दिल्ली में स्थित है. सिविल सर्विस डे पर प्रधानमंत्री ने डाक विभाग कि सचिव को विभाग के उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित भी किया है. डाक विभाग की वेबसाईट पर भी तमाम जानकारियाँ ली जा सकती हैं. आशा करता हूँ कि इस पोस्ट के बाद यह भ्रम टूट जाना चाहिए कि डाक एवं तार (P&T) जैसी कोई चीज अब अस्तित्व में है. अब मात्र भारतीय डाक विभाग है और टेलीग्राम सेवाएँ दूरसंचार विभाग के साथ जुड़ चुकी हैं !!

Wednesday, April 21, 2010

युग-युग जियो डाकिया भैया

युग-युग जियो डाकिया भैया, सांझ सबेरे इहै मनाइत है.....
हम गंवई के रहवैया
पाग लपेटे, छतरी ताने, कांधे पर चमरौधा झोला,
लिए हाथ मा कलम दवाती, मेघदूत पर मानस चोला
सावन हरे न सूखे कातिक, एकै धुन से सदा चलैया......

शादी, गमी, मनौती, मेला, बारहमासी रेला पेला
पूत कमासुत की गठरी के बल पर, फैला जाल अकेला
गांव सहर के बीच तुहीं एक डोर, तुंही मरजाद रखवैया
थानेदार, तिलंगा, चैकीदार, सिपाही तहसीलन के
क्रुकअमीन गिरदावर आवत, लोटत नागिन छातिन पै
तुहैं देख कै फूलत छाती, नयन जुड़ात डाकिया भैया
युग-युग जियो डाकिया भैया.......

अनिल मोहन

Sunday, April 18, 2010

पत्रों का घटता चलन एक गंभीर सांस्कृतिक खतरा- महाश्वेता देवी


भारतीय डाक विभाग के 150 वर्ष पूरे होने पर ‘भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा’ नामक पुस्तक लिखकर चर्चा में आए अरविंद कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. अरविन्द जी से जब पहली बार मेरी बातचीत हुई थी तो वे हरिभूमि से जुड़े हुए थे, फ़िलहाल रेल मंत्रालय की मैग्जीन ‘भारतीय रेल’ के संपादकीय सलाहकार के रूप में दिल्ली में कार्यरत हैं। ‘भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा’ पुस्तक में जिस आत्मीयता के साथ उन्होंने डाक से जुड़े विभिन्न पहलुओं की चर्चा की है, वह काबिले-तारीफ है. यहाँ तक कि दैनिक पत्र हिंदुस्तान में प्रत्येक रविवार को लिखे जाने वाले अपने स्तम्भ 'परख' में इसकी चर्चा मशहूर लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट महाश्वेता देवी ने "अविराम चलने वाली यात्रा'' शीर्षक से की. (2 अगस्त, 2009). इसे हम यहाँ साभार प्रस्तुत कर रहे हैं !!

(यहाँ यह उल्लेख करना जरुरी है कि महाश्वेता देवी ने भी अपने आरंभिक वर्षों में डाक विभाग में नौकरी की थी)

Wednesday, April 14, 2010

भारत में अन्तराष्ट्रीय डाक टिकट (फिलेटलिक) प्रदर्शनी का आयोजन

'INDIPEX-2011' का आयोजन 12-18 फरवरी, 2011 के मध्य प्रगति मैदान, दिल्ली में किया जा रहा है. भारत में पहली अन्तराष्ट्रीय डाक टिकट (फिलेटलिक) प्रदर्शनी का आयोजन 1954 में डाक टिकटों की शताब्दी वर्ष में हुआ था. इस डाक टिकट प्रदर्शनी का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने ही दुनिया में सर्वप्रथम इलाहबाद से नैनी के मध्य प्रतीकात्मक रूप में एयर-मेल सेवा आरंभ की. यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। अर्थात जिस दिन 'INDIPEX-2011' के आयोजन का अंतिम दिन होगा, उसी दिन इस ऐतिहासिक घटना के 100 साल भी पूरे हो जायेंगें. 'INDIPEX-2011' के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इन लिंकों पर जाएँ-
'INDIPEX-2011'
'INDIPEX-2011'

Monday, April 12, 2010

भारत में सबसे पहले चिट्ठियों ने भरी थी हवाई उड़ान

डाक सेवा का विचार सबसे पहले ब्रिटेन में और हवाई जहाज का विचार सबसे पहले अमेरिका में राइट बंधुओं ने दिया वहीं चिट्ठियों ने विश्व में सबसे पहले भारत में हवाई उड़ान भरी। यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। संयोग से उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उस दिन एक लाख से अधिक लोगों ने इस घटना को देखा था जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो इलाहाबाद के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया।

आंकड़ों के अनुसार कर्नल वाई विंधाम ने पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी। मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा। विमान को फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट ने उड़ाया।

(चित्र में : भारतीय डाक द्वारा वर्तमान में प्रयुक्त फ्रेटर)

Saturday, April 10, 2010

क्या-क्या न कराये ये डाक टिकट संग्रह का शौक


हम सभी ने बचपन मे ढेर सारी शरारतें की होंगी, अब चिट्ठाकार है तो निसंदेह बचपन(अभी भी कौन से कम है) मे खुराफाती रहे ही होंगे। नयी नयी चीजें ट्राई करना और नए नए शौंक पालना किसे नही पसन्द? तो आइए जनाब आज बात करते है बचपन के कुछ खुराफाती शौंक की। इसी बहाने हम सभी अपने अपने बचपन मे ताक झांक कर लेंगे।

डाकटिकटों का संग्रह ये शौंक अक्सर सभी बच्चों मे पाया जाता है। अब पुराने जमाने मे चिट्ठियों का बहुत चलन था, इसलिए डाक टिकटों का संग्रह कोई महंगा शौंक नही था। पहले पहल तो हमने अपने घर मे आने वाले सारे पत्रों की डाक टिकटों का संग्रह करना शुरु किया। हम पत्रों को पाते ही, सफाई से उसकी डाक टिकट निकाल लिया करते थे, धीरे धीरे हमे डाक टिकट निकालने मे अच्छी खासी काफी महारत हासिल होने लगी। सबसे पहले हमने रामादीन पोस्टमैन को मोहरा बनाया। बस ठाकुर के होटल पर बिठाकर एक कटिंग चाय पिलाने मे काम बन जाता था। जब तक रामादीन चाचा चाय और समोसे पर हाथ साफ़ करते , हम लोग डाकटिकटों पर हाथ साफ कर देते।

थोड़े दिनो मे रामादीन ने भी डिमांड करनी शुरु कर दी , बोले कटिंग चाय और बांसी समोसे से काम नही चलेगा, बोले आधा पाव दूध वाली चाय और मिठाई खिलाओ। हम लोगों ने कास्ट बेनिफिट एनालिसिस किया, और यह निश्चय किया कि हम रामादीन की वामपंथियो टाइप ब्लैकमेलिंग के आगे नही झुकेंगे और कांग्रेस की तरह अपने बलबूते मैदान मे उतरेंगे। इस तरह से हम लोगों ने, आत्मनिर्भर होकर मोहल्ले की चिट्ठियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया।

हमारे लिए घर के बाहर लगे चिट्ठी वाले डाक बक्से खोलना भी कोई बड़ी बात नही रही थी। अब वो ज्ञान ही क्या जो अपना प्रकाश दूर दूर तक ना फैलाए, सो इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए हमने अपनी इस महारत को गली मौहल्ले के बच्चों तक पहुँचाया। लोगों को अब पत्र बिना डाक टिकट के मिलने लगे थे, पहले पहल तो लोगों को पता ही नही चलता, लेकिन धीरे धीरे कुछ शक्की लोगों ने हम लोगों की निगरानी शुरु कर दी थी। एक दो बार पकड़े भी गए, सूते भी गए, अब वो शौंक ही क्या, जो दबाने से दब जाए। हमारा यह शौंक जारी रहा, धीरे धीरे लोगों ने डाक टिकटों की परवाह करनी छोड़ दी।

अगली समस्या थी संग्रह करने की। हम लोग एक डब्बे मे डाक टिकटे संग्रहित करते, लेकिन टिल्लू और मैने एक दूसरे पर चोरी का इल्जाम लगाया। जो कि काफी हद तक सही इल्जाम था। काफी मुहाँचाई और हाथापाई के बाद नतीजा निकला कि हम लोग अपनी अपनी स्कूल की किताबों और कापियों मे टिकट सम्भालकर रखेंगे। थोड़े दिनो तक तो हम किताबों के अन्दर ही डाकटिकट संग्रहित कर लेते थे, लेकिन परेशानी ये होती थी, स्कूल मे दोस्त यार डाकटिकट छुवा देते, अब हमारी मेहनत पर कोई हाथ साफ करे, ऐसा कैसे हो सकता था। सो हम लोगों ने डाक टिकट संग्रह करने के लिए एक फाइल खरीदने का निश्चय किया। अब ये शौंक महंगा लगने लगा था।

अपने शौंक को और बेहतर बनाने के लिए हम हैड पोस्ट ऑफिस वाले पोस्टमास्टर से मिले, उसने हमको और नयी नयी कहानी समझा दी। बोला इस तरह का डाक टिकट संग्रह कुछ मायने नही रखता, तुम लोग फर्स्ट डे स्टैम्प का संग्रह करो, यानि जिस भी दिन कोई नयी डाक टिकट जारी हो (वैसे भी भारत मे इतने राजनेता वगैरहा है, किसी ना किसी की जन्म, मृत्यू या कोई एचीवमेंट डे अक्सर हर दिन होता ही रहता है।) पोस्ट ऑफिस मे आओ, फर्स्ट डे स्टैम्प कार्ड खरीदो, डाक टिकट लगाओ,स्टैम्प लगवाओ और उसको संग्रहित करो। मामला खर्चीला था, लेकिन अब क्या करें, जानकारी कम थी, इसलिए इनकी नसीहत को भी अपनाना पड़ा।

धीरे धीरे देशी डाकटिकटो से मन भर गया तो हम विदेशी चिट्ठियों की डाक टिकटों पर हाथ साफ़ करने लगे। उस जमाने मे सोवियत संघ से किताबे आया करती थी, उस पर डाकटिकट हुआ करते थे। हम लोग वो डाकटिकट छुवा दिया करते थे। फिर एक दिन पता चला कि किदवई नगर मे एक दुकानदार बाकायदा विदेशी डाकटिकटों की बिक्री करता है। ब्रिटेन, रोमानिया, हंगरी, नामिबिया और ना जाने कौन कौन से देशों की नयी नयी डाकटिकटे देखने को मिली। हमने जब उसके सोर्स के बारे मे जाँच पड़ताल की तो हमे पता चला कि वो जनाब विदेशी डाकटिकटों की रिप्रिंटिग करके बेचते थे। चोर को मिले मोर, हम लोग हर हफ़्ते(जिस दिन जेबखर्च मिलता था) किदवई नगर जाकर, डाक टिकट खरीदेते, खरीदते क्या जी, चार खरीदते और आठ चुपचाप गायब कर लाते। इस तरह से चोर के घर चोरी का सिलसिला शुरु हुआ। धीरे धीरे दुकानदार को हम पर शक होने लगा और उसने हम लोगों की दुकान मे इंट्री ही बैन कर दी। अब वो खुद चोरी करता था तो सही था, हम लोग करते थे तो गलत, ये कहाँ का इन्साफ़ है। सही कहते है, चोर वही होता है जो पकड़ा जाता है। अब हमारी जेबखर्च का आधा हिस्सा कामिक्स मे और बाकी का हिस्सा डाक टिकटों मे खर्च (ईमानदारी से खरीदने में) होने लगा. आप भी अपनी बचपन की डाकटिकटों के संग्रह वाली कहानी छापना मत भूलना।

साभार : http://www.jitu.info/merapanna/?gtlang=sq